October 2026_DA | Page 33

अभरी भरी है । दलित साहित््य आज प्रगति पर है, इसमें संदेह नहीं । कविता, कहानरी, उपन्द्यास, निबन््ध, आलोचना आदि कई विधाओं में दलित साहित््य आज विकास कर रहा है, लेकिन अधिकांश करी दिशा स्पष््ट नहीं है, उसमें एक भ्टकाव दिखाई दे रहा है । नए दलित लेखकों में इतिहास और परम्परा का बोध है । पररर्ामस्िरूप, कुछ गैर-दलित, विशेष रूप से ब्राह्मर् लेखक दवलतों पर लिखकर दलित लेखकों के बरीच समादृत हो रहे हैं । समादृत हो रहे हैं, कोई बात नहीं, क््योंकि दलित साहित््य कोई भरी लिख सकता है, पर वे नेतृत्ि भरी कर रहे हैं, ्यह दुखद है । ्यह हमारे इतिहास और परम्परा के विरुद्ध है । कबरीर और रैदास साहेब ने ब्राह्मर् का नेतृत्ि स्िरीकार नहीं वक्या, और बाबासाहेब ्डोा. आंबे्डोकर ने भरी दलित आन्ददोलन का नेतृत्ि किसरी गैर-दलित को नहीं वद्या था । हमें इस परम्परा को नहीं तोड़ना है । ्यह हमारे सौंदर््यशास्त् करी परम्परा है, किसरी गैर-दलित का नेतृत्ि अगर हम स्िरीकार करेंगे, तो वह हमाररी सौंदर््य-चेतना को बदल सकता है । ्यह एक बड़री चुनौतरी है, दलित साहित््य के सामने । सवाल ्यह भरी है कि ्यह चुनौतरी कैसे पैदा हुई? मुझे इसके परीछे अध््य्यन करी समस््या लगतरी है । आज के अधिकांश नए दलित लेखक इतिहास और परम्परा को पढ़कर नहीं आए हैं, उन्दहोंने ्डोा. आंबे्डोकर को भरी ठरीक से नहीं पढ़ा है, वे अगर ्डोा. आंबे्डोकर करी हरी साररी रचनाओं को पढ़ लें, तो मुझे विश्िास है कि वे एक नई चेतना और ऊजावा से भर जायेेंगे । कोई चुनौतरी फिर पेश नहीं आएगरी । कोई नेतृत्ि उसे भ्टका नहीं सकेगा ।
सतत प्रवाहित प्राचीन परंपरागत धारा
दलित साहित््य और अम््बबेडकरवादरी साहित््य देखने में एक लगता है, पर, दोनों एक है नहीं । अलग-अलग हैं । आंबे्डोकरवादरी साहित््य करी अवधारर्ा ्डोा. तेज सिंह ने दरी थरी । वह माक्सवािादरी साहित््य से प्रभावित थे, और उसकरी प्रवतवरि्या में आंबे्डोकरवादरी साहित््य रखना
चाहते थे । मैं उनकरी इस अवधारर्ा से असहमत था । इस पर मेरा एक लेख भरी छपा है । दरअसल जब हम आंबे्डोकरवादरी साहित््य कहते हैं, तो हम दलित साहित््य का दा्यरा सरीवमत कर देते हैं और आंबे्डोकर से पहले और बाद करी दलित चिंतन-धारा से क्ट जाते हैं । दलित साहित््य का उद्भव ्या जन््म न तो ्डोा. आंबे्डोकर से शुरू हुआ है, और न ्डोा. आंबे्डोकर पर खत्म होता है । इसकरी सुदीर््घ परम्परा है, जिसमें पूररी अवैदिक धारा समाहित है । कबरीर और रैदास साहेब हरी नहीं, बक्ल्क उनसे भरी पहले के समतामूलक समाज के स्िप्नदशशी, शिल्पकार और दाशवावनक इसके आधार-स्तम्भ हैं, ्यह परम्परा ्डोा. आंबे्डोकर के आन्ददोलन और चिंतन से चेतनशरील और ऊजावािान हुई है और आगे भरी ्यह वर््णव््यवस्था के समूल-नाश में सभरी भािरी दलित-बहुजन नायकोों से प्रेरर्ा लेतरी रहेगरी ।
हिंदी दलित साहित्य में स्त्ी- विमश्श का अभाव नहीं
ऐसा माना जाता है कि हिंदरी दलित साहित््य में दलित स्त्री विमशवा का अभाव होता है । असल में ्यह दलित शिक्ा से जुड़ा हुआ मामला है ।
आ्ज़ादरी के पचास साल गुजर जाने के बाद भरी दलित जातियोों में अशिक्ा भ्यानक स्तर पर थरी । गांिों में तो क्स्थवत और भरी बदतर थरी । शहरों में ्यह हाल था कि पूररी-पूररी बक्स्त्यों में गिनतरी के एक-दो परिवार हरी अपने बच्ों को पढ़ाने का साहस कर पाते थे, वो भरी लड़कों को, लड़कियोों को फिर भरी नहीं पढ़ाते थे । लड़के पहले पढ़े और लड़वक्यां बहुत बाद में । इसे गररीबरी कह लरीवजए, ्या पुरुषवादरी सोच कह लरीवजए ्या कुछ भरी, पर सच ्यहरी है कि शिक्ा का प्रसार पुरुिों में पहले हुआ, इसलिए साहित््य में भरी दलित पुरुष हरी पहले आए । क्स्त््यां बाद में आईं । लेकिन फिर भरी ्यह आरोप पूररी तरह सच नहीं है कि हिंदरी दलित साहित््य में स्त्री-विमशवा का अभाव है । अनेक दलित कहानियोों में स्त्री-विमशवा मौजूद है । ओमप्रकाश वाल्मरीवक करी‘ अम्मा’, ज्यप्रकाश कदवाम करी‘ सांग’, कुसुम वि्योगरी करी‘ और वह पढ़ गई’ स्त्री-विमशवा करी हरी कहावन्यां हैं । अज्य नावरर्या ने तो स्त्री-विमशवा करी कई कहावन्यां लिखरी हैं । हालाँकि ्यह स्त्री-विमशवा उस स्तर का नहीं है, जो दलित लेखिकाओं के स््वयं के लेखन में उभरा है, पर हम ्यह नहीं कह सकते कि वहाँ एकदम अभाव है । अवश््य
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