October 2026_DA | Page 28

रिपोट्ट

समग्र विकास क़े लिए दलितोों को चाहिए समानता का अधिकार

नानकचन््द

उ

त्तर आधुनिकता के ्युग में भरी सामाजिक असमानता और अस्पृश््यता करी समस््या दलित समाज के विकास के मागवा में एक गंभरीर समस््या बनरी हुई है । दलित समाज आज भरी सामाजिक और आवथवाक समानता प्राप्त नहीं कर पा्या है । लेकिन ्यह प्रमावर्त होता है कि सम्य करी माँग के अनुसार दवलतों करी दशा और दिशा में आमूल चूल पररितवान अवश््य हुआ है । केंद्र सरकार और राज््य सरकार ने दलित समाज में अभिशप्त गररीबरी करी समस््या के निराकरर् के लिए विवभन् सरकाररी ्योजनाएं वरि्यान््ववित करी हैं लेकिन फिर भरी दलित समाज सामाजिक और आवथवाक रूप से सशक्त नहीं हो पा्या है । ्डोॉ. अम््बबेडकर ने दलित समाज में शिक्ा के प्रति चेतना उत्पन् करी जिससे ह्ज़ारों ििषों से शोषित दलित िगवा अपना सामाजिक और आवथवाक विकास कर सके । लेकिन सवाल ्यह भरी है कि दलित समाज के जनजरीिन को गररीबरी किस तरह प्रभावित कर रहरी है और वो कौन से कारक हैं कि दलित समाज एकजु्ट होने में नाकाम्याब दिखाई पड़ता है? और क््या ितवामान में दलित समुदा्य के जनजरीिन में सकारात्मक पररितवान हो पा्या है ्या नहीं?
भारत एक लोकताक्न्दत्क देश है जिसमें 75 प्रतिशत लोग ग्रामों में निवास करते हैं । आ्ज़ादरी के 75 ििषों के पश्चात भरी भारत में जाति अपनरी जड़ जमा्ये हुए है । ऐसा माना जाता है कि भारत का लोकतंत् बेजोड़ है जिसकरी जड़ें बेहद म्ज़बूत हैं और ्यहाँ का शासन कानून-सम्मत है । लेकिन प्रश्न ्यह है कि आ्ज़ादरी के इतने ििषों के अंतराल के पश्चात भरी एक विशेष समुदा्य के साथ शोिर् और उत्परीड़न करी घ्टना क््यों घव्टत होतरी हैं? ्यह
इस देश का दुभावाग््य है कि ्डोॉ. अम््बबेडकर के द्ारा बनाए गए संविधान के साथ खिलवाड़ वक्या जा रहा है । हम २१िीं सदीं में प्रवेश कर चुके हैं लेकिन दलित समाज के साथ शोिर् और उत्परीड़न करी घ्टनाओं में निरंतर वृद्धि हो रहरी है लेकिन कुछ शिक्ाविदों का वक्तव््य है कि समाज करी मानसिकता में पररितवान अवश््य आ्या है । लेकिन ्यह बिल्कुल गलत है क््योंकि अगर पररितवान हुआ है तो दलित समाज करी मानसिकता में पररितवान हुआ है । ्यह कहने में संकोच नहीं है कि जिस देश में इं्टरने्ट के ्युग में भरी दलित िगवा के अधिकारों का हनन वक्या जाता है, वहां ्यह कैसे कह सकते हैं कि भारतरी्य समाज करी सोच में निरंतर पररितवान आ रहा है?
आंकड़ों के अनुसार बता्या जाता है कि हम 10 पसचें्ट करी ग्रोथ रे्ट हासिल कर लेंगे और चरीन को परीछे छोड़ देंगे और जिससे देश में प्रति व््यक्क्त आ्य बढ़कर दोगुनरी हो जाएगरी । विश्लेिर् वक्या जा्ये तो ्यह सिवाविदित है कि भारत के शासन, प्रशासन, कावमवाक मंत्ालयोों और विभागों पर उच् िगषों का हरी प्रभुत्ि रहा है लेकिन फिर भरी हमारा देश गररीबरी समस््या और जाति के अभिशाप से क््यों परीवड़त है? लेकिन इसका उत्तर सभरी के पास है । अगर देश का विकास करना है तो दलित िगवा को समानता का अधिकार देना हरी होगा जिससे ह्ज़ारों ििषों से बहिष्कृत समाज देश करी मुख््य धारा से जुड़कर जन कल््ययाण के का्यषों में अपना ्योगदान दे सकें । राज््य सरकार और केंद्र सरकार दलित िगवा के सामाजिक और आवथवाक विकास के लिए विवभन् सरकाररी ्योजनाए वरि्यान््ववित कर रहरी है । लेकिन इस तरफ किसरी का ध््यान नहीं है कि दलित समाज को कैसे देश करी मुख््यधारा से जोड़ सकें? भारतरी्य राजनरीवतज्ों को सिवाप्रथम दलित समाज पर ध््यान देने करी
ओर ्ज़रूरत है क््योंकि इतिहास ्यह प्रमावर्त करता है कि देश के आवथवाक विकास में दलित िगवा ने महत्तवपूर््ण भूमिका निभाई है ।
दलित िगवा का ह्ज़ारों ििषों से दमन वक्या जाता रहा है चाहे वो बथानरी ्टोला हत््याकां्डो हो, खैरलांजरी हत््याकां्डो हो और चाहे वमचवापुर हत््याकां्डो हो । दलित समाज के सामाजिक और आवथवाक विकास के मागवा में विवभन् बाधक तत्ि हैं जिसके कारर् दलित िगवा पूर््ण रूप से विकास नहीं कर पा्या है । दलित िगवा के सामाजिक और आवथवाक जरीिन को गररीबरी, जाति क्ेत्िाद, धमवा, भ्रष््टाचार, महंगाई, कुपोिर्, अशिक्ा, जनसंख््या, प्राकृतिक आपदा्य आदि मुख््य कारक प्रभावित कर रहे हैं । भूमं्डोलरीकरर् के ्युग में भरी दलित िगवा के विकास में गररीबरी एक प्रमुख समस््या बनरी हुई है । केंद्र सरकार और राज््य सरकार दलित
28 vDVwcj 2026