October 2026_DA | Page 19

यहां गांधी दश्शन की सबसे महत्िपूर््ण प्रासंगिकता सामने आती है । गांधी विकास के प्रश्न को केवल उत्पादन और उपभोग की मात्ा से नहीं देखते र्े । उनके लिए मनुष्य की गरिमा, सामाजिक न्दयाय और प्रकृति के सार् संतुलन भी उतना ही महत्िपूर््ण र्ा । आज की अर््थव्यिस्र्ा में विकास की गति आवश्यक है, लेकिन उसके सार् यह सवाल भी बना रहना चाहिए कि उस विकास का लाभ किस तक पहुंच रहा है और उसकी सामाजिक तर्ा पया्शिरर्ीय कीमत कौन चुका रहा है ।
पर लागू करना व््यािहारिक नहीं हो सकता । पहाड़री, वन और सरीमाितशी क्ेत्ों करी भौगोलिक तथा सामाजिक पररक्स्थवत्यों के अनुसार विकास करी रर्नरीवत अलग होनरी चाहिए ।
्यहां गांधरी दशवान करी सबसे महत्िपूर््ण प्रासंगिकता सामने आतरी है । गांधरी विकास के प्रश्न को केवल उत्पादन और उपभोग करी मात्ा से नहीं देखते थे । उनके लिए मनुष््य करी गरिमा, सामाजिक न्द्ययाय और प्रकृति के साथ संतुलन भरी उतना हरी महत्िपूर््ण था । आज करी अथवाव््यवस्था में विकास करी गति आवश््यक है, लेकिन उसके साथ ्यह सवाल भरी बना रहना चाहिए कि उस विकास का लाभ किस तक पहुंच रहा है और उसकरी सामाजिक तथा प्यावािरर्री्य करीमत कौन चुका रहा है ।
आदिवासरी समाज को भरी केवल संरक्षण करी वस्तु समझना उचित नहीं होगा । उसके पास प्राकृतिक संसाधनों, स्थानरी्य पाररक्स्थवतकरी और सामुदाव्यक जरीिन का अनुभव है । दूसररी ओर आधुनिक भारत के पास विज्ान, तकनरीक, पूंजरी और व््यापक बाजार करी शक्क्त है । ्यवद दोनों को परस्पर विरोधरी मानने के बजा्य साझेदार बना्या जाए तो विकास का अधिक व्टकाऊ मॉ्डोल तै्यार हो सकता है ।
गांधरी और आदिवासरी समाज को एक-दूसरे का पर््ययाय मानना ऐतिहासिक रूप से सहरी नहीं होगा । दोनों करी अपनरी अलग पृष्ठभूमि और विशिष््टता है । लेकिन प्रकृति के प्रति जिम्मेदाररी, सामुदाव्यक सह्योग, श्रम करी प्रतिष्ठा, स्थानरी्य अथवाव््यवस्था, स्िािलंबन और अंतिम व््यक्क्त करी गरिमा जैसे प्रश्नों पर दोनों के बरीच साथवाक संवाद करी जमरीन अवश््य है ।
आज करी दुवन्या में जब विकास करी परिभाषा तेजरी से बदल रहरी है, तब गांधरी का प्रश्न फिर सामने आता है— विकास किसके लिए और किस करीमत पर? आदिवासरी समाज इस प्रश्न को केवल सैद्धांवतक नहीं, बक्ल्क अपने दैनिक जरीिन के अनुभव से सामने रखता है । जंगल बचे तो आजरीविका बचेगरी, जमरीन सुरवक्त रहे तो समुदा्य करी निरंतरता बनरी रहेगरी और शिक्ा-तकनरीक पहुंचे तो नई पीढ़़ी आधुनिक अवसरों से जुड़
यहां गांधी दश्शन की सबसे महत्िपूर््ण प्रासंगिकता सामने आती है । गांधी विकास के प्रश्न को केवल उत्पादन और उपभोग की मात्ा से नहीं देखते र्े । उनके लिए मनुष्य की गरिमा, सामाजिक न्दयाय और प्रकृति के सार् संतुलन भी उतना ही महत्िपूर््ण र्ा । आज की अर््थव्यिस्र्ा में विकास की गति आवश्यक है, लेकिन उसके सार् यह सवाल भी बना रहना चाहिए कि उस विकास का लाभ किस तक पहुंच रहा है और उसकी सामाजिक तर्ा पया्शिरर्ीय कीमत कौन चुका रहा है ।
सकेगरी ।
इसलिए‘ प्रकृति से स्िराज तक’ करी ्यात्ा केवल गांधरी और आदिवासरी समाज के बरीच समानताएं खोजने करी ्यात्ा नहीं है । ्यह भारत के विकास मॉ्डोल को अधिक मानिरी्य, सहभागरी और व्टकाऊ बनाने करी तलाश भरी है । गांधरी दशवान हमें सं्यम, स्िािलंबन और अंतिम व््यक्क्त करी चिंता करी ्याद दिलाता है, जबकि oआदिवासरी जरीिन-मूल््य हमें प्रकृति, समुदा्य और स्थानरी्य ज्ान करी शक्क्त का अनुभव कराते हैं । आधुनिक भारत के सामने चुनौतरी ्यहरी है कि इन मूल््यों को अतरीत करी स्मृवत बनाकर न छोड़ा जाए, बक्ल्क उन्दहें विज्ान, तकनरीक और आधुनिक
लोकतंत् के साथ जोड़कर भविष््य करी विकास- दृष््टटि का हिस्सा बना्या जाए ।
्यवद विकास करी मंजिल केवल आवथवाक आंकड़ों करी ऊंचाई नहीं, बक्ल्क समाज के अंतिम व््यक्क्त के जरीिन में सम्मान, अवसर और सुरक्ा का विस्तार भरी है, तो गांधरी दशवान और आदिवासरी जरीिन-मूल््यों के बरीच ्यह संवाद आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है । प्रकृति करी रक्ा, समुदा्य करी भागरीदाररी और मनुष््य करी गरिमा— इन तीनोों को साथ लेकर चलने वाला विकास हरी वह रास्ता हो सकता है, जिसमें आधुनिक भारत करी प्रगति और उसकरी सभ््यतागत आत्मा एक-दूसरे के साथ कदम मिला सकें । �
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