October 2026_DA | Página 13

अखिलेश यादव के लिए चुनौती इससे आगे की है । 2027 का चुनाव केवल यादव-मुब्स्िम समीकरर् या भाजपा विरोधी वोट के सहारे नहीं लड़ा जाएगा । सपा ने खुद पीडीए को अपनी राजनीति का आधार बनाया है । इसका मतलब है कि दलित समाज को केवल चुनावी संख्या नहीं, बब्ल्क राजनीतिक भागीदार बनाना होगा ।
करी राजनरीवतक विरासत को चुनौतरी देता है । ्यवद अखिलेश परी्डोरीए के जरिए दलित मतदाताओं को अपने साथ स््थथायी रूप से जोड़ना चाहते हैं तो उन्दहें केवल सम्मेलन और संपक्क अवभ्यान से आगे जाना होगा । मा्यावतरी करी राजनरीवत भले चुनािरी रूप से कमजोर दिख रहरी हो, लेकिन दलित मतदाता के भरीतर उनकरी पहचान को नजरअंदाज करना सपा के लिए जोखिम होगा ।
टीएमसी और क्षेत्ीय साझेदार— साझा मंच, अलग हित
इं्डोरी गठबंधन में तृर्मूल कांग्रेस जैसे क्ेत्री्य दलों करी भूमिका भरी महत्िपूर््ण है । पक्श्चम बंगाल में कांग्रेस और ्टरीएमसरी के राजनरीवतक संबंध ्यूपरी करी सपा-कांग्रेस क्स्थवत से अलग हैं । ऐसे दल राष्ट्ररी्य स्तर पर भाजपा के खिलाफ साझा मुद्ों पर साथ आ सकते हैं, लेकिन अपनरी-अपनरी राज््यों करी राजनरीवतक जरूरतों के हिसाब से स्ितंत् रर्नरीवत भरी अपनाते हैं ।
्यहरी इं्डोरी गठबंधन करी ताकत और कमजोररी दोनों है । साझा मुद्े उसे एक मंच देते हैं, लेकिन अलग-अलग राज््यों करी राजनरीवत उसे एकसमान चुनािरी गठबंधन बनने से रोकतरी है । सरीईसरी विरोध में भरी ्यहरी विरोधाभास दिखाई देता है ।
वाम दल और अन्द्य विपक्षी साझेदार लोकतांवत्क संस्थाओं, वनिावाचन प्रवरि्या और नागरिक अधिकारों के मुद्े पर लंबे सम्य से मुखर रहे हैं । लेकिन उनके सामने भरी ्यहरी चुनौतरी है कि राष्ट्ररी्य स्तर के आंदोलन को अपने राज््यों करी राजनरीवतक जमरीन से कैसे जोड़ा जाए ।
इं्डोरी गठबंधन करी समस््या केवल नेतृत्ि करी नहीं, बक्ल्क साझा राजनरीवतक कथा करी भरी है । ्यवद हर दल इस आंदोलन को अपने-अपने चुनािरी चश्मे से देखेगा तो सं्युक्त अवभ्यान करी धार कमजोर होगरी । िहीं ्यवद कांग्रेस पूररी तरह केंद्ररी्य भूमिका में रहेगरी तो क्ेत्री्य साझेदारों करी राजनरीवतक पहचान दबने का खतरा रहेगा ।
विपक् को ्यह भरी समझना होगा कि मतदाता सूचरी का सवाल केवल राजनरीवतक आरोपों से नहीं चलेगा । एसआईआर को लेकर आरोप हैं तो
अखिलेश यादव के लिए चुनौती इससे आगे की है । 2027 का चुनाव केवल यादव-मुब्स्िम समीकरर् या भाजपा विरोधी वोट के सहारे नहीं लड़ा जाएगा । सपा ने खुद पीडीए को अपनी राजनीति का आधार बनाया है । इसका मतलब है कि दलित समाज को केवल चुनावी संख्या नहीं, बब्ल्क राजनीतिक भागीदार बनाना होगा ।
उनके समथवान में प्रमार्, आंकड़े और क्ेत्िार विवरर् भरी सामने आने चाहिए । दूसररी ओर वनिावाचन आ्योग को भरी आरोपों को खारिज करने के साथ प्रवरि्या करी अधिकतम पारदवशवाता सुवनक्श्चत करनरी होगरी । चुनाव आ्योग करी विश्िसनरी्यता केवल वैधानिक अधिकार से नहीं, बक्ल्क जनता के विश्िास से बनतरी है ।
अखिलेश ्यादव के लिए चुनौतरी इससे आगे करी है । 2027 का चुनाव केवल ्यादव-मुक्स्लम समरीकरर् ्या भाजपा विरोधरी वो्ट के सहारे नहीं लड़ा जाएगा । सपा ने खुद परी्डोरीए को अपनरी राजनरीवत का आधार बना्या है । इसका मतलब है कि दलित समाज को केवल चुनािरी संख््या नहीं, बक्ल्क राजनरीवतक भागरीदार बनाना होगा ।
यहीीं कांग्रेस, सपा और बसपा के बरीच असलरी राजनरीवतक मुकाबला दिखाई देता है । कांग्रेस संविधान और लोकतंत् के नैरेव्टि के जरिए व््यापक सामाजिक आधार बनाना चाहतरी है । सपा
परी्डोरीए के जरिए पिछड़े, दलित और अल्पसंख््यक मतदाताओं को एक राजनरीवतक छतररी के नरीचे लाने करी कोशिश कर रहरी है । मा्यावतरी अपने पारंपरिक दलित आधार को बचाए रखने करी चुनौतरी में हैं । तीनोों करी रर्नरीवत्यां अलग हैं, लेकिन 2027 में इनके असर का सरीधा संबंध उत्तर प्रदेश के चुनािरी पररर्ामों से होगा ।
सरीईसरी विरोध ने विपक् को एक मंच जरूर वद्या है, लेकिन उसरी मंच पर सामाजिक प्रतिनिधित्ि का सवाल भरी खड़ा कर वद्या है । परी्डोरीए आखिर कितना सामाजिक न्द्ययाय है और कितना चुनािरी गवर्त? ्यह सवाल अब केवल राजनरीवतक भािर् का विि्य नहीं रहेगा ।
अखिलेश ने 403 सरी्टों करी ओर देखने करी बात कह दरी है । अब उनकरी असलरी पररीक्ा दिल्लरी करी सड़क पर नहीं, उत्तर प्रदेश के गांिों, कस्बों और विधानसभा क्ेत्ों में होगरी । कांग्रेस के साथ राष्ट्ररी्य मंच साझा करते हुए ्यूपरी में अपनरी
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