ज्ान
कांड ्िोक 33,34 । ्यह प्रमाण इस तथ्य का उदबोधक है कि रामा्यर काल में भ़ीि, निषाद शूद्र आदि को अछूत नहीं समझा जाता थिा । राजा धृतराषट् के ्यहां पूर्व के सदृश अरालिक और सूपकार आदि शुद्र भोजन बनाने के लिए लन्युकत हुए थिे ।( महाभारत आ पर्व 1 / 19)। इन प्रमाणों से ्यह सिद होता है कि वैदिक काल में शुद्र अछूत नहीं थिे । कालांतर में कुछ अज्ाऩी लोगों ने छुआछूत कि गलत प्रथिा आरमभ कर द़ी जिससे जातिवाद जैसे विककृत मानसिकता को प्रोतिाहन मिला ।
शंका 9- अगर रिाह्मण का पुत् गुण क्म्ण सवभाव से रहित हो तो कया वह शुद्र कहलायेगा और अगर शुद्र गुण क्म्ण और सवभाव से गुणवान हो तो कया वह रिाह्मण कहलायेगा?
समाधान- वैदिक वर्ण व्यवस्था के अनुसार रिाह्मण का पुरि विद्ा प्रासपत में असफल रहने पर शूद्र कहला्येगा वैसे ह़ी शूद्र का पुरि भ़ी विद्ा प्रासपत के उपरांत अपने रिाह्मण, क्लरि्य ्या वैश्य वर्ण को प्रापत कर सकता है । ्यह समपूर्ण व्यवस्था विशुद रूप से गुणवत्ता पर आधारित है । जिस प्रकार शिक्ा पूि़ी करने के बाद आज उपालध्याँ द़ी जात़ी है उि़ी प्रकार वैदिक व्यवस्था में ्यज्ोपव़ीत लद्या जाता थिा । प्रत्येक वर्ण के लिए निर्धारित कर्तव्य कर्म का पालन व निर्वाहन न करने पर ्यज्ोपव़ीत वापस लेने का भ़ी प्रावधान थिा । वैदिक इतिहास में वर्ण परिवर्तन के अनेक प्रमाण उपस्थित है, जैसे-
( 1) ऐतरे्य ऋषि दास अथिवा अपराध़ी के पुरि थिे परनतु अपने गुणों से उच्च कोल्ट के रिाह्मण बने और उनहोंने ऐतरे्य रिाह्मण और ऐतरे्य उपनिषद क़ी रचना क़ी थि़ी । ऋगवेद को समझने के लिए ऐतरे्य रिाह्मण अतिश्य आवश्यक माना जाता है |
( 2) ऐलूष ऋषि दाि़ी पुरि थिे, जुआि़ी और ह़ीन चरिरि भ़ी थिे, परनतु बाद में उनहोंने अध्य्यन लक्या और ऋगवेद पर अनुसनधान करके अनेक
आविषकाि लक्ये । ऋलष्यों ने उनहें आमंलरित कर के आचा्य्त पद पर आि़ीन लक्या थिा( ऐतरे्य रिाह्मण 2 / 19)।
( 3) सत्यकाम जाबाल गणिका( वेश्या) के पुरि थिे परनतु वे रिाह्मणतव को प्रापत हुए ।( छानदोग्योपनिषद 4 खंड 4 / 4)।
( 4) राजा दक् के पुरि पृषध शूद्र हो गए थिे, प्रा्यस्चत ्वरुप तपस्या करके उनहोंने मोक् प्रापत लक्या ।( विषरु पुराण 4 / 1 / 14)। अगर उत्तर रामा्यर क़ी मिथ्या कथिा के अनुसार शूद्रों के लिए तपस्या करना मना होता तो पृषध ्ये कैसे कर पाए?
( 5) राजा नेदिष्ट के पुरि नाभाग वैश्य हुए, पुनः इनके कई पुरिों ने क्लरि्य वर्ण अपना्या ।( विषरु पुराण 4 / 1 / 13)।
( 6) धृष्ट नाभाग के पुरि थिे परनतु रिाह्मण हुए और उनके पुरि ने क्लरि्य वर्ण अपना्या ।( विषरु पुराण 4 / 2 / 2)।
( 7) आगे उन्ही के वंश में पुनः कुछ रिाह्मण हुए ।( विषरु पुराण 4 / 2 / 2)।
( 8) भागवत के अनुसार राजपुरि अलनिवेश्य रिाह्मण हुए ।
( 9) विषरुपुराण और भागवत के अनुसार िथिोतर क्लरि्य से रिाह्मण बने थिे ।
( 10) हारित क्लरि्य पुरि से रिाह्मण हुए थिे ।( विषरु पुराण 4 / 3 / 5)।
( 11) क्लरि्य कुल में जनमें शौनक ने रिाह्मणतव प्रापत लक्या । वा्यु, विषरु और हरिवंशपुराण कहते है कि शौनक ऋषि के पुरि कर्म भेद से रिाह्मण, क्लरि्य, वैश्य और शूद्र वर्ण के हुए । इि़ी प्रकार गृतिमद, गृतिमति और व़ीतहव्य के उदाहरण है ।( विषरु पुराण 4 / 8 / 1)।
( 12) मातंग चांडालपुरि से रिाह्मण बने थिे ।( महाभारत राजधर्म अध्या्य 27)।
( 13) ऋषि पुि्त्य का पौरि रावण अपने कमगों से राक्ि बना थिा ।
( 14) राजा रघु का पुरि प्रवृद राक्ि हुआ थिा ।
( 15) लरिशंकु राजा होते हुए भ़ी कमगों से चांडाल बन गए थिे ।
38 uoacj 2025