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वर्ण को छोड़ ऩीच, अनत्यज्य अथिवा ककृष्ट्यन, मुसलमान हो ग्या है उसको भ़ी रिाह्मण क्यूँ नहीं मानते? इस पर ्यह़ी कहेंगे कि उसने " रिाह्मण के कर्म छोड़ लद्ये इसलि्ये वह रिाह्मण नहीं है " इससे ्यह भ़ी सिद होता है कि जो रिाह्मण आदि उत्तम कर्म करते है वह़ी रिाह्मण
और जो ऩीच भ़ी उत्तम वर्ण के गुण, कर्म ्वाभाव वाला होवे, तो उसको भ़ी उत्तम वर्ण में, और जो उत्तम वर्णस्थ हो के ऩीच काम करे तो उसको ऩीच वर्ण में गिनना अवश्य चालह्ये ।
सत्याथि्त प्रकाश में ्वाम़ी द्यानंद लिखते है श्ेष्ठों का नाम आ्य्त, विद्ान, देव और दुष्टों के
दस्यु अथिा्तत डाकू, मुर्ख नाम होने से आ्य्त और दस्यु दो नाम हुए । आर्यों में रिाह्मण, क्लरि्य, वैश्य एवं शुद्र चार भेद हुए ।( सत्याथि्त प्रकाश अष्टम समुलिाि)।
मनु ्मृलत के अनुसार जो शुद्र कुल में उतपन् होके रिाह्मण, क्लरि्य और वैश्य गुण, कर्म
्वभाव वाला हो तो वह शुद्र रिाह्मण, क्लरि्य और वैश्य हो जा्ये । वैसे ह़ी जो रिाह्मण क्लरि्य और वैश्य कुल में उतपन् हुआ हो और उसके गुण, कर्म ्वभाव शुद्र के सदृश्य हो तो वह शुद्र हो जा्ये । वैसे क्लरि्य वा वैश्य के कुल में उतपन् होकर रिाह्मण, रिाह्मऱी वा शुद्र के समान होने
से रिाह्मण वा शुद्र भ़ी हो जाता हैं । अथिा्तत चारों वरगों में जिस जिस वर्ण के सदृश्य जो जो पुरुष वह ्रि़ी हो वह वह उि़ी वर्ण में गिना जावे ।( सत्याथि्त प्रकाश चतुथि्त समुलिाि)।
आप्तमभ सूरि का प्रमाण देते हुए ्वाम़ी द्यानंद कहते है कि धर्माचरण से निककृष्ट वर्ण अपने से उत्तम उत्तम वरगों को प्रापत होता है और वह उि़ी वर्ण में गिना जावे, कि जिस जिस के ्योग्य होवे । वैसे ह़ी अधर्माचरण से पूर्व पूर्व अथिा्तत उत्तम उत्तम वर्ण वाला मनुष्य अपने से ऩीचे-ऩीचे वाले वरगों को प्रापत होता हैं, और उि़ी वर्ण में गिना जावे ।( आप्तमभ सूरि 2 / 5 / 1 / 1)। ्वाम़ी द्यानंद जातिवाद के प्रबल विरोध़ी और वर्ण व्यवस्था के प्रबल समथि्तक थिे । वेदों में शूद्रों के प्ठन पा्ठन के अधिकार एवं साथि बै्ठ कर खान पान आदि करने के लिए उनहोंने विशेष प्र्यास लक्ये थिे ।
शंका 8- कया वेदादि शासत्ों ्में शुद्र को अछूत बताया गया है?
समाधान- वेदों में शूद्रों को आ्य्त बता्या ग्या हैं I इसलिए उनहें अछूत समझने का प्रश्न ह़ी नहीं उ्ठता हैं । वेदादि शा्रिों के प्रमाण सिद होता है कि रिाह्मण वर्ग से से लेकर शुद्र वर्ग आपस में एक साथि अन् ग्रहण करने से परहेज नहीं करते थिे । वेदों में ्पष्ट रूप से एक साथि भोजन करने का आदेश है ।
हे लमरिों तुम और हम मिलकर बलवर्धक और सुगंध ्युकत अन् को खा्ये अथिा्तत सहभोज करे ।( ऋगवेद 9 / 98 / १२)।
हे मनुष्यों तुमहािे पाऩी प़ीने के स्थान और तुमहािा अन् सेवन अथिवा खान पान का स्थान एक साथि हो ।( अथिव्तवेद 6 / 30 / 6)।
महाराज दशिथि के यज्ञ में शूद्रों का पका्या हुआ भोजन रिाह्मण, तपस्वी और शुद्र मिलकर करते थिे ।( वाल्मीकि रामा्यर सु्िोक १२)।
श्री रामचंद्र ज़ी द्ािा भ़ीिऩी शबि़ी के आश्म में जाकर उनके पाँव छूना एवं उनका आतिथ्य स्वीकार करना ।( वाल्मीकि रामा्यर सुंदरकांड ्िोक 5,6,7, निषादराज से भें्ट होने पर उनका आलिंगन करना ।( वाल्मीकि रामा्यर अ्योध्या
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