वह महाशि बन गई। िसंह पर सवार हो देवी ने मिहषासुर को यु@ के िलए ललकारा। िफर Iोध भरी गज ना
के समय देवी ने दस भुजाओं म धारण दीि?मान अK4 से उस दानव पर ,हार िकए। घनघोर यु@ के उपरांत
मिहषासुर का अंत हH आ। इस तरह पाप पर पुMय क7 िवजय हH ई। देवताओं ने शि के इस व'प को दुगा कहा
और उनक7 पूजा होने लगी।
इितहास पूजा का
दुगा प ज
ा का इितहास देख तो पूजा क7 वत मान परपंरा करीब चार सदी पुरानी नजर आती है। जहां तक Nात
है , सोलहवD शताOदी के अंत म बंगाल के तािहरपुर म महाराज कंशनारायण दुगा प ज
ा का भ%य अनुPान
िकया था। घर म बड़े से ठाकुर दालान को सजाकर उसम दुगा क7 ,ितमा थािपत क7 गई। उसके बाद
सQहवD शताOदी के आरं भ म नािदया के महाराज भवानंद ने तथा बरीसा के सुवण चौधुरी ने भी भ%य पूजा का
आयोजन िकया था। उसके बाद बड़े - बड़े जमDदार4 ने इस शैली को अपना िलया। उस समय दुगा प ज
ा के समय
पशुबिल भी दी जाती थी। बंगाल के राजा - रजवाड़4 ने इस परं परा को आगे बढ़ाया। समय के साथ - साथ
%यावसाियक वग ने इसे और समृ@ बनाया। लेिकन जब उSह4ने अपने िहत के िलए ईट इंिडया कंपनी के
अफसर4 को पूजा म आमंिQत करना शु' िकया तो इसम एक नया मोड़ आया। कोलकाता के शोवा बाजार के
महाराजा नवकृGणदेव Uारा 1757 म राबट Aलाइव को पूजा म िनमंिQत करना इस तरह का ,थम उदाहरण
था। इसके बाद पूजा ,ितPा का िवषय बनने लगी। लेिकन जब मह2वपूण लो ग4 के सामने साधारण भ4 क7
अवहे लना होने लगी तो दुगा प ज
ा ठाकुर दालान4 से बाहर मैदान4 म पंडाल लगाकर मनाई जाने लगी। 20 वD
शताOदी के शु' म बारह लोग4 Uारा हH गली िजले के गु?ीपाड़ा म हH ई साव जिनक पूजा को पहली साव जिनक
पूजा कहा जाता है। 1910 म बलरामपुर वसुघाट पर एक धािम क सभा Uारा साव जिनक 'प म दुगा प ज
ा मनान
के बाद इसका चलन बढ़ता गया। इसे बारोबाड़ी पूजा भी कहा जाता था। वतंQता सं\ाम के दौरान कई बार
साव जिनक पूजा को राG]ीय फोरम के 'प म भी ,योग िकया गया। धीरे - धीरे समूचे बंगाल म साव जिनक पूजा
मनायी जाने लगी।
भ%य हो गया है आयोजन
आज दुगा प ज
ा का आयोजन इतना भ%य हो गया है िक इसक7 तैयारी महीन4 पूव आरं भ हो जाती है। इसके िलए
जगह - जगह पूजा कमे िटयां बनती ह8 जो चंदा आिद एकQ कर पंडाल4 के आकार व मूित य4 के व'प का
िनण य लेती ह8। दुगा मां क7 मूित बनाने का काम भी परं परागत मूित कार4 Uारा काफ7 पहले आरं भ कर िदया
जाता है। बंगाल के हर शहर और कबे म ये मूित कार पीढ़ी दर पीढ़ी इस कला याQा को जारी रखे ह8। इनके
प^रवार4 के अनेक लोग बंगाल के बाहर भी , जहां बंगाली बहH सं_या म ह8 मूित कला क7 इस शैली का िवतार
कर रहे ह8। मूित िनमा ण का काय िविधपूवक पूजापाठ के बाद आरं भ होता है। कोलकाता म परं परागत
मूित कार4 क7 बती म एक ,ाचीन रीित चली आ रही है िजसके अनुसार मूित िनमा ण के िलए पहल
सोनागाछी या कालीघाट से तवायफ4 के आंगन क7 िमaी लाई जाती है। उसी िमaी को िमलाकर दुगा क7 पिवQ
मूित का िनमा ण होता है। पूजा के िलए बड़े - बड़े पंडाल भी कई स?ाह पूव बनने आरं भ हो जाते ह8। लकड़ी , बांस ,
bलाईवुड , तcबू आिद क7 सहायता से िवतृत पंडाल बनाने म समय जो लगता है। िफर इनके अंदर क7 साज -
सdजा म हर ,कार क7 भ%यता का समावेश भी िकया जाता है। छोटे शहर4 म पूजा पंडाल4 म भ%यता कम होती
है। लेिकन बड़े शहर4 क7 पूजा कमे िटयां पंडाल पर िदल खोलकर %यय करती ह8। कुछ पंडाल तो महल4 जैसे
नजर आते ह8। दरअसल पंडाल4 क7 भ%यता आज एक ,ितपधा का 'प ले चुक7 है। पंडाल4 क7 छत4 पर बड़े -
बड़े झूमर लगाए जाते ह8। लकड़ी क7 दीवार4 पर सुंदर िचQ बनाए जाते ह8। ब0ब4 और रं गिबरं गी रोशनी क7
मनमोहक झांिकयां बनाने के िलए बंगाल के चंदन नगर से िवशेष कलाकार बुलाए जाते ह8। पंडाल4 म िकसी
भी नवीनतम घटना पर झांक7 बनाने का ,यास होता है। ये कलाकार सुर - असुर सं\ाम जैसी पौरािणक
झांिकय4 से लेकर कारिगल यु@ और व0ड ]ेड सटर जैसे िवषय4 क7 बेहद आकष क झांिकयां बना देते ह8।
Special Volume 1, October 2015
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