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होगी । उस समय तो और भी पलौधे रहे होंगे । लोगों ने कैसे समझा होगा कि इसे खाना चाहिए और इसके खाने से लाभ है । तब आज की भांति प्रयोगशालाएं तो थीं नहीं । आज हमें पता है कि उसमें विटामिन सी है, तब कैसे पता चला होगा? इससे पता चलता है कि भारत का प्राचीन ज्ान- विज्ान कितना महान रहा होगा । मनुष्य के जीवन के जितने भी आयाम हो सकते हैं, उन सभी में भारत अग्णी था । चाहे वह शिक्षा का आयाम हो या फिर शरीर रचना का हो, मशसतष्क का आयाम हो, ककृहष का हो, राजसि का हो या फिर प्रशासन का हो । सभी राजनीतिक, सामाजिक,
वर्तमान में परिललषित नहीं प्ाचीन मान्यताएं
अब बात यह है कि केवल यह कहने से कि भारत काफी महान था, मुझ जैसे लोग संतुष्ट नहीं हो सकते । हमने पचास-सलौ ग्ंथ और 15- 20 विषय गिनवा दिये कि यह सब कुछ भारत में था, परंतु यह बात अधूरी है । चूँकि प्राचीन महानता वर्तमान में परिलक्षित नहीं हो रही और इसलिए भविष्य में वह हमारे साथ नहीं जाएगी । प्राचीन मानयताएं आज से दो-चार सलौ वर्ष पहले वर्तमान में परिलक्षित नहीं हुईं और इसलिए उस
मानना है कि जो भारतीय ज्ान संपदा है, उसका वैज्ाहनक वि्लेषण किए जाने की आि्यकता है । हमें भारत के शासत्रों को धार्मिक शासत्र कहना बंद करना होगा । जैसे ही हम धर्म की बात करते हैं, मन पूजा-अर्चना की ओर चला जाता है जिससे शासत्रों में छिपा विज्ान कहीं पीछे छूट जाएगा । भावोशकत तो आ जाएगी, लेकिन उसका भाव गायब हो जाएगा । हम उसकी भशकत तो करेंगे, परंतु उस भशकत का आधार हमसे छूट जाएगा । हमें अपने शासत्रों को ज्ान-विज्ान की पुसतकों की तरह देखना होगा । हमें अपनी चीजों को विज्ान की दृष्टि से देखने का सिभाव
आर्थिक और यहाँ तक कि विदेशनीति संबंधित ज्ान भी भारत में था । श्ीककृष्ण विदेशनीति पढ़ते थे । चंद्रगुपत मलौय्य ने विदेशनीति पढ़ी थी, श्ीराम को विदेशनीति पता थी ।
वकत का वर्तमान हमारे साथ नहीं आया, वहीं छूट गया । हमारे पास आयुिदेद में इतना ज्ान था, आज कहाँ है? हमारे पास आड पाइथागोरस प्रमेय है, परंतु हमारी अपनी मय दानव का प्रमेय कहाँ है, बोधायन का प्रमेय का कहाँ है? मेरा
विकसित करना होगा ।
धर्म और आधयातम में निहित विज्ान
मैं भोजपुर गया था । वहाँ राजा भोज द्ारा
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