केरल( 3.22 प्रतिशत), पश्चम बंगाल( 8 प्रतिशत) और पुडुचेरी( 7.57 प्रतिशत) में मतदाताओं की संख्या में गिरावट आई है । तमिलनाडु, केरल, पुडुचेरी और असम में अंतिम मतदाता सूमच्यां प्रकाशित हो चुकी हैं, जबकि पश्चम बंगाल में गत 28 फरवरी को जारी सूची में 60 लाख से अधिक मतदाताओं को ' विचाराधीन ' के रूप में मचमनित मक्या ग्या है, जिनके मामलों का मनणथा्य ््या्याल्य द्ारा मन्युकत ््याम्यक अधिकारर्यों द्ारा मक्या जा रहा है । इन मतदाताओं के नाम ्पषट होने पर उ्हें अंतिम सूची में शामिल मक्या जाएगा, उसके बाद ही वह विधानसभा चुनावों में मतदान कर सकेंगे ।
पश्चिम बंगाल में परिवर्तन का माहौल
पश्चम बंगाल अबकी बार राजनीतिक रूप से परिवर्तन की राह पर है । 2011 की जनगणना
के अनुसार राज्य में दलित समाज की जनसंख्या लगभग 1.85 करोड है, जिसमें 80 लाख मतुआ संप्रदा्य के लोग हैं । राज्य में 84 विधानसभा सीट अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरमक्त है । तृणमूल नेता ममता बनजजी के का्यथाकाल में पश्चम बंगाल वह राज्य बन ग्या है, जहां हिंदू जनसंख्या दूसरे दजचे के नागरिकों के रूप में रह रही हैं । स्रमत ्यह है कि ममता सरकार ने पूरे राज्य को आक्रामक इ्लामवामद्यों के हाथों में सौंप मद्या ग्या है । राज्य की दलित जनता इ्लामिक उतपीडन और दमन का शिकार बन रही है । इ्लामिक कट्टरता के कारण राज्य एक और खूनी विभाजन की ओर अग्रसर हो रहा है और रोजाना होने वाली प्रा्योजित राजनीतिक हिंसा के कारण दलित और गरीब वर्ग की जनता सबसे ज्यादा पीड़ित है ।
1947 में विभाजन के सम्य राज्य में मुस्लम
जनसंख्या 19 प्रतिशत थी, जो वर्ष 2011 में बढ़कर 27 प्रतिशत हो गई । राज्य में जिस तरह से मुस्लम जनसंख्या बढ़ी, उसका नकारातमक परिणाम राज्य की दलित, आदिवासी और पिछडी मह्दू जनसंख्या को भोगना पड़ रहा है । ्यह पश्चम बंगाल का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि राज्य में दलित, वनवासी और पिछड़ा मह्दू समाज ्ितंत्ता से पहले भी उतपीडन और दमन को झेलने के लिए अभिशपत था और ्यही हालात वर्तमान में भी हैं । राज्य में सर्वहारा वर्ग के समग्र कल्याण का दावा करने वाले वाममोर्चा शासनकाल के 32 िषयों से लेकर तृणमूल नेता ममता के शासनकाल में भी स्थितियों में कोई परिवर्तन नहीं आ्या । बंगाली भाषी दलितों में, नमशूद्र और मतुआ समाज सबसे प्रमुख और राजनीतिक रूप से जागरूक समूह हैं, मज्होंने 19वीं एवं 20वीं शताबदी में सामाजिक और
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