जनप्रतिनिधि तो हैं ही , इस हैसियत से उनहें जनता को बरगलाने की जगह समझाने का काम करना चाहिए था । शायद ही कोई दिन ऐसा जाता होगा जब अखिलेश सोशल मीडिया के माधयर से बीजेपी और मोदी-योगी सरकार को खरी खोटी नहीं सुनाते हों । वह कोरोना पर राजनीति करते हैं , वैकसीन पर सवाल उठाते हैं । ऑकसीजन और दवाओंकी कमी पर सरकार को घेरते हैं । मगर अपने आप से नहीं पूछते हैं कि वह योगी की तरह घर से बाहर निकलकर जनता के दुख-दर्द को बांटने का काम कयों नहीं करते हैं । अखिलेश यादव के पिछले कु छ महीनों का कायमारिर देख लिया जाए तो यह समझने में देरी नहीं लगेगी कि अखिलेश एक- दो मौकों का छोड़कर घर से बाहर निकले ही नहीं हैं । निकले भी होंगे तो कभी पंचायत चुनाव में वोट डालने या फिर पारिवारिक कारणों से । वैसे इसमें कु छ नया भी नहीं हैं कयोंकि अखिलेश प्रदेश की जनता को वोट बैंक से अधिक कु छ समझते ही कहां हैं , यह बात किसी से छिपी नहीं है ।
सत्ता में रहते भी अखिलेश जनता से मेल- मिलाप बढ़ाना या मुलाकात करना पसंद नहीं करते थे । इसीलिए उनहें 2014 के लोकसभा चुनाव से लेकर 2017 के विधानसभा चुनाव और 2019 के लोकसभा चुनाव में ही नहीं , कई उप-चुनावों में भी करारी हार का सामना करना पड़ा था । रही बात हाल में समपनन हुए पंचायत चुनाव की तो भले ही समाजवादी पाटथी प्रमुख अखिलेश यादव नतीजों को लेकर जनता के
अखिलेश यादव के पिछले कु छ महीनों का कायमारिर देख लिया जाए तो यह समझने में देरी नहीं लगेगी कि अखिलेश एक-दो मौकों का छोड़कर घर से बाहर निकले ही नहीं हैं । निकले भी होंगे तो कभी पंचायत चुनाव में वोट डालने या फिर पारिवारिक कारणों से ।
सामने अपनी पीठ थपथपा रहे हों , परंतु 2021 पंचायत चुनाव के नतीजे समाजवादी पाटथी के लिए किसी ‘ आईने ’ से कम नहीं हैं । समाजवादी पाटथी 2016 के पंचायत चुनाव तक का आंकड़ा नहीं छू पाई है । ऐसा नहीं है कि कोरोना महामारी के चलते योगी सरकार की लोकप्रियता का ग्ाफ गिरा है बपलक योगी की प्रयासों की तरीफ हो रही है । यह तारीफ बीजेपी नहीं अनय राजयों की हाईकोर्ट कर रहे हैं । विदेशों तक में योगी के काम करने के तरीके की चर्चा है , लोग योगी के महामारी से निपटने के तौर-तरीके से काफी खुश हैं । कोरोना को नियंत्रित करने के लिए योगी सरकार द्ारा लिए गए निर्णयों से प्रभावित होकर अनय राजयों की सरकारें भी उस पर अमल कर रही हैं , इसमें कु छ कांग्ेस की राजय सरकारें भी हैं ।
अचछी बात यह है कि जिस रासते पर अखिलेश यादव चल रहे हैं वह रासता बहुजन समाज पाटथी की सुप्रीमो मायावती ने नहीं पकड़ा है । ऐसा लगता है कि मायावती का नकारातरक राजनीति से मोह भंग हो गया
है । इसीलिए वह कोरोना महामारी के समय जनता को भड़काने की बजाए योगी सरकार को सही रासता दिखाने का जयादा प्रयास करती हुई दिखती हैं । मायावती के कु छ सुझाव सरकार को सकारातरक भी लगे हैं । आजकल मायावती उतना ही बोलती हैं जितना जरूरी होता है । कम शबदों में वह मोदी-योगी सरकार के सामने बसपा का नजरिया प्रकट करती हैं । कहीं कोई धमकी नहीं कहीं कोई झूठा गुससा नहीं । इसीलिए पूर्व सीएम मायावती यह कहकर चुप हो जाती हैं कि पंचायत चुनाव के बाद गांव देहात में कोरोना फै लने से लोग दशहत में हैं । सरकार को इसकी रोकथाम के लिए युद्धसतर पर काम करना चाहिए , वहीं मायावती देश के विभिनन राजयों में कोरोना वैकसीन व असपतालों में इलाज हेतु ऑकसीजन की जबर्दसत कमी को देखते हुए के नद्र सरकार से अनुरोध करती सुनाई पड़ जाती हैं कि ऑकसीजन की सपलाई सुपनपचित करने के लिए प्राथमिकता के आधार पर मोदी सरकार विशेष धयान दे और यदि इसके लिए आयात करने की जरूरत पड़ती है तो आयात भी किया जाए । एक तरफ सरकार को संदेश तो दूसरी तरफ देश की जनता से भी वह बार-बार अपील कर रही हैं कि राजय सरकारों द्ारा कोरोना महामारी से बचाव के उपाय के तहत जो भी सखती तथा सरकारी गाइड लाइनस बतायी जा रही हैं हैं उसका सही से अनुपालन करें ताकि कोरोना प्रकोप की रोकथाम हो सके अर्थात् लोग भी अपनी जिमरेदारी को निभाएं । इसके अलावा मायावती इस बात पर भी चिंता जताती हैं कि कोरोना वायरस अब युवाओं को भी अपनी चपेट में लेने लगा है । अतः वह यह कहने से भी गुरेज नहीं करती हैं कि कोरोना वैकसीन के संबंध में उम्र की सीमा के संबंध में भी के नद्र सरकार को यथाशीघ्र पुनर्विचार करना चाहिए । अफसोस ऐसी भाषा अखिलेश ही नहीं राहुल-प्रियंका को भी समझ में नहीं आती है । यह नेता कोरोना से हालात सुधरें इसकी बजाए हालात बिगाड़ने की मुहिम में जयादा लगे हैं । कहीं सपा-कांग्ेस की यही हठधरथी एक बार फिर उनहें हाशिये पर नहीं ढके ल दें कयोंकि जनता सब जानती है । उसे बेवकू फ नहीं बनाया जा सकता है । �
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