समाज
दलित चिंतन विकास के परिप्ेशय में लोकमान्य तिलक के हिमालय सरीखे रयककतत्-विचार-ककृवतत् को कदापि अस्ीकार नहीं किया जा सकता है । स्तंत्ता मिलने के लगभग तीन दशक पहले ही अपने दमृढ संकलप और दूर दमृकष्ट इरादे को वकत के पन्ों पर अंकित कर देने मिसाल उन्होंने कायम की थी । दो टूक शबदों में उन्होंने विद्रोही बिगुल बजाया था कि यदि ईस्र अस्पृसयता को मानेगा तो मैं उसके अकसतत् को स्ीकार करने को तैयार नहीं हूँ ।
लाया गया । नतरीिा सामने है ।
जाति करी सरीमाओं को तोड़ते हुए पारसपरिक समरसता करी डगर पर सबका साथ-सबका ल्वकास के उदरोर के साथ आगे बढ़ते हुए आज देश को एक ऐसा प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदरी के रूप में मिला है, जो सुराज लाने का गाँधरी िरी का सपना साकार करने और पंडित दरीनदयाल के उदगार अंतिम पायदान पर खड़े वरक्त के ल्वकास के लिए ककृत संकलप होने का अहसास यथार्थ के धरातल से पूररी लशद्त के साथ करा रहा है । भाजपा शासित राजरों में हाल में हुई दलित उत्पीड़न करी र्टनाओं करी जितनरी भरी निंदा करी जाये, काम होगरी । लेकिन देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदरी ने अपने कड़े रूख का अहसास भरी कराया है । मार्ग बाधाओं से ल्वचलित हुए बिना दलितों के समग् ल्वकास का उनका अभियान सतत जाररी है और लक्र को हासिल करने के लिए भरी ककृत संकलप है ।
राजनरीलत के खेल का इसे प्रतरीक कहा जायेगा कि मामूलरी मौका मिलते हरी ल्वकास करी समग् मुहिम करी ह्वा निकलने करी साजिशें शुरू हो जातरी है । नेपथ्य के आगे परीछे से जाररी खेल करी भरी दरअसल अपनरी बेचैनरी है । दलितों और पिछड़ों करी लड़ाई का दा्वा करने ्वाले ्वाम दल अब काफरी परीछे छू्ट चुके हैं । इसकरी ्वाम दलों ने कभरी कलपना भरी नहीं करी थरी । कांग्ेस करी बैशाखरी बनने और उसके साथ कनधा से कनधा मिलाकर चलने में उनहोंने किंचित परहेज नहीं किया । यहरी ्वह बिंदु हैं, जिसकरी भरपाई करना ्वाम दलों के लिए फिलहाल संभ्व नहीं है । ्वग्य शत्ु से हाथ मिलाने का कुपरिणाम है भरोसे का ्टू्टना । इसरी ्टू्टे भरोसे करी ्विह से कांग्ेस और ्वाम दल अब राजनरीलत के किनारे पर आ कर खड़े हो गए हैं । दलित और आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों के ल्वकास का ढोंग करने और निज हित साधकर अपने को सुदृढ़ करने
के खेल का दौर समापत हो चुका है । अब लस्का उसरी का चलेगा जो दलितों के समग् ल्वकास करी इबारत लिखेगा । इस कसौ्टरी पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदरी का संकलप सबका साथ-सबका ल्वकास, वरक्त पैमाने पर खरा उतरने का सहज हरी अहसास करा देता है ।
दलित चिंतन ल्वकास के परिप्रेशर में लोकमानर तिलक के हिमालय सररीखे वरक्तत्व- ल्वचार-ककृलतत्व को कदापि अस्वरीकार नहीं किया जा सकता है । स्वतंत्ता मिलने के लगभग तरीन दशक पहले हरी अपने दृढ संकलप और दूर दृकष््ट इरादे को वक्त के पन्नों पर अंकित कर देने मिसाल उनहोंने कायम करी थरी । दो ्टूक श्दों में उनहोंने ल्वद्रोहरी बिगुल बजाया था कि यदि ईस्वर असपृसरता को मानेगा तो मैं उसके अकसतत्व को स्वरीकार करने को तैयार नहीं हूँ । लनकशचत हरी लोकमानर तिलक एक बेजोड़ शिखर हसताक्षर थे । उनका निधन भले हरी 1 अगसत 1920 को भले हरी हो गया हो, लेकिन ्वह भारतरीर मानस प्टल पर अपनरी अलम्ट छाप के साथ साथ युगों तक अमर रहेंगे । इस कडरी में एक शास्वत बात बाबा साहब अमबेडकर ने भरी कहरी थरी, ्वह यह कि देश करी राजनरीलत में शरीर्ष सथान पर बैठे लोग चरित्रवान होने चाहिए । समपूर्ण समाज के उतकर्ष का मनोभा्व और वरक्तगत स्वाथवो करी शूनरता हरी श्ेष्ठ चररत् का लक्षण और इसरी से हरी दलित समाज का समग् कलरार और ल्वकास संभ्व है । �
50 tqykbZ 2026