July 2026_DA | Page 47

समय के पैमाने से इस सच को कदापि नाकारा नहीं जा सकता है कि दलितोतथान से समाज और देश का समग् ल्वकास संभ्व है । इस शाश्वत हकरीकत के आलोक में हमारे संल्वधान में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक ए्वं राजनरीलतक क्षेत् में उनके हित और सशक्तकरण के लिए अनेक नियम, कानून, प्रा्वधान तथा कार्यकम ए्वं योजनाएं बनायीं गररी हैं । बाबा साहेब भरीम रा्व अमबेडकर ने अनुसूचित जातियों और जनजातियों को सं्वैधानिक धरातल से सुदृढ़ करने का जो प्रा्वधान पेश किया, सहरी मायने में देखा जाये तो उस पर अम्लीकरण नहीं हो
सका । लनकशचत हरी इसका श्ेर कांग्ेस पार्टी को जाता है । इससे बडरी ल्वडमबना ्रा हो सकतरी है कि कथनरी में बाबा साहेब आंबेडकर करी छल्व को भुनाया गया और करनरी में दलित आंदोलन करी धार को " गोठिल " करने करी भ्रामक चाल किसरी से छिपरी है । ऐसे दोहरेपन को लक्र कर बाबा साहेब अमबेडकर ने कांग्ेस को जलता हुआ घर बताया था और दलित नेताओं को इसमें शामिल होने के खिलाफ आगाह किया था । अतरीत के पृष्ठों पर यह हकरीकत दर्ज है कि कांग्ेस ने यश्वंत रा्व चवहार के माधरम से महाराष्ट् में दलित नेतृत्व को हथियाने का कुकतसत खेल खेला । दलित नेता उसके इस
चक्वरह में फंसते चले गए । उनका तर्क यह था कि इससे ्वह दलित हितों का भला कर सकेंगेI लेकिन दलित समाज के समग् ल्वकास करी बजाय दलित समाज के भरीतररी जालत्वादरी पेंच को ऐसा फंसाया गया कि दलितों का ल्वकास इसरी में उलझ कर रह गया । अपनरी-अपनरी डफलरी पर अपना-अपना राज बजाया जाता रहा और दलित चिंतन और दलित ल्वकास महज ्वो्ट बैंक का जरिया बन कर रह गया ।
स्वतंत्ता के बाद बाबा साहेब अमबेडकर के चिंतन और आंदोलन से लेकर आजतक सामाजिक-राजनरीलतक दलित आंदोलन के दृकष््टपथ में दलितों का अंदुरुनरी जालत्वाद एक ल्वककृत चुनौतरी बनकर खड़ा है । यह बात अलग है कि सैकड़ों जातियों में ब्टे दलित समाज करी कुछ जातियां सामाजिक नरार के सं्वैधानिक प्रा्वधानों के फलस्वरूप ल्वकास फलक पर अपनरी उपकसथलत दर्ज कराने में कामयाब हुई है, लेकिन उनका नजरिया भरी समाज के ्वंचित दलितों के प्रति भेदभा्व और उपेक्षापूर्ण बना हुआ है । इस परिप्रेक्र में यह कदापि ल्वसमृत नहीं किया जाना चाहिए कि बाबा साहब अमबेडकर ने प्रतरेक पिछड़े और शोषित ्वग्य के लिए आिरी्वन संघर्ष किया था । ल्वरमता और असपृसरता जैसरी शर्मनाक कुररीलतरों के ल्वरुद्ध उनहोंने जिस बुलंदरी के साथ आ्वाज उठाररी, ्वह युगों-युगों तक इतिहास के पन्नों में अमर हो गररी । दलित समाज का समग् ल्वकास और एक समरस भारत बनाने करी उनकरी अपनरी परिकलपना थरी । देश करी लन्वा्यचन व्यवसथा में दलित नेतृत्व को सुअ्वसर मुहैया कराने के मद्ेनजर लोक सभा, राजर सभा, ल्वधान सभा और ल्वधान परिषदों में दलित समाज के सदसरों को आरक्षण करी व्यवसथा सुनकशचत करी गररी । यह महज इसलिए नहीं करी गररी थरी कि इसका फायदा हासिल करके कोई दलित सांसद, ल्वधायक या मंत्री बनकर सिर्फ लनिरी और अपने परर्वार का हित साधन करे और अकूत धन समपलत हासिल करीमरी लेयर के मद में चूर होकर दलित और महादलित करी ल्वकासपरक चिंताओं को ल्वसमृलत कर मात् ्वो्ट बैंक के दायरे में
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