July 2026_DA | Seite 30

विशेष

हरी नहीं, अपितु भोगा भरी था । ततकालरीन िल्टल सामाजिक समसराओं पर उनकरी पैनरी निग़ाह थरी । उनके समाधान हेतु ्वे आिरी्वन प्रयासरत रहे, परंतु उललेखनरीर है कि उनका समाधान ्वे परकरीर दृकष््ट से नहीं, बकलक भारतरीर दृकष््टकोण से करना चाहते थे । स्वतंत्ता, समानता, भ्रातृत्व पर आधारित समरस समाज करी रचना का स्वप्न लेकर ्वे आिरी्वन चले । उनकरी अग्रणी भूमिका में तैयार किए गए संल्वधान में उन स्वप्नों करी सुंदर छल्व देखरी जा सकतरी है । ्वंचितों-शोषितों-कसत्रों को नरार ए्वं सममान दिलाने के लिए किए गए कार्य उनहें महानायकत्व देने के लिए पर्यापत हैं । ्वे भारत करी मिट्टी से गहरे जुड़े थे, इसरीलिए ्वे कमरुलनस्टों करी ्वग्यल्वहरीन समाज करी सथापना ए्वं द्ंद्ातमक भौतिक्वाद को कोरा आदर्श मानते थे ।
धूर्त हैं कमयुवनसट, कांग्ेसी भी सही नहीं
देश करी पररकसथलत-परर्वेश से क्टरी-छं्टरी उनकरी मानसिकता को ्वे उस प्रारंभिक दौर में भरी पहचान पाने करी दूरदृकष््ट रखते थे । उनहोंने 1933 में महाराष्ट् करी एक सभा को संबोधित करते हुए कहा कि ' कुछ लोग मेरे बारे में दुष्प्रचार
कर रहे हैं कि मैं कमरुलनस्टों से मिल गया हूं । यह मनगढ़ंत और बेबुनियाद है । मैं कमरुलनस्टों से कभरी नहीं मिल सकता ्रोंकि कमरुलनस्ट स्वभा्वतः धूर्त होते हैं । ्वे मजदूरों के नाम पर राजनरीलत तो करते हैं, पर मज़दूरों को भयानक शोषण के चक में फंसाए रखते हैं । अभरी तक कमरुलनस्टों के शासन को देखकर तो यहरी स्पष्ट होता है ।' इतना हरी नहीं उनहोंने नेहरू सरकार करी ल्वदेश नरीलत करी भरी आलोचना करी थरी । ्वे पहले वरक्त थे, जिनहोंने 1952 में नेहरू सरकार करी यह कहते हुए आलोचना करी थरी कि उसने सुरक्षा परिषद करी स्थायी सदसरता के लिए कोई प्रयत्न नहीं किया । उनहोंने स्पष्ट कहा ' भारत अपनरी महान संसदरीर ए्वं लोकतांलत्क परंपरा के आधार पर संयु्त राष्ट् करी सुरक्षा-परिषद का स्वाभाल्वक दा्वेदार है । और भारत सरकार को इसके लिए प्रयत्न करना चाहिए ।' 1953 में ततकालरीन नेहरू सरकार को आगाह करते हुए उनहोंने चेताया ' चरीन लत्बत पर आधिपतर सथालपत कर रहा है और भारत उसकरी सुरक्षा के लिए कोई पहल नहीं कर रहा है, भल्वष्र में भारत को उसके गंभरीर परिणाम भुगतने होंगें ।' लत्बत पर चरीन के क्जे का उनहोंने बहुत मुखर ल्वरोध किया था और इस मुद्े को ल्वश्व-मंच
पर उठाने के लिए ततकालरीन नेहरू सरकार पर दबा्व भरी बनाया था ।
कशमीर और मुसलमानों के मामले में सपष्ट सोच
बाबा साहब नेहरू द्ारा कश्मीर के मुद्े को संयु्त राष्ट् संघ में ले जाने करी मुखर आलोचना करते रहे । शेख अ्दुलला के साथ धारा 370 पर बातचरीत करते हुए उनहोंने कहा कि आप चाहते हैं कि कश्मीर का भारत में ल्वलय हो, कश्मीर के नागरिकों को भारत में कहीं भरी आने-जाने-बसने का अधिकार हो, पर शेष भारत्वासरी को कश्मीर में आने-जाने-बसने का अधिकार न मिले । देश के क़ानून-मंत्री के रूप में मैं देश के साथ ल्वश्वासघात नहीं कर सकता । नेहरू करी सममलत के बा्विूद अ्दुलला को उनका यह दो ्टूक उत्तर उनके साहस ए्वं देशभक्त का आदर्श उदाहरण था । मज़हब के आधार पर हुए ल्वभाजन के पशचात ततकालरीन कांग्ेस नेतृत्व द्ारा मुसलमानों को उनके हिससे का भूभाग( कुल भूभाग का 35 प्रतिशत) दिए जाने के बा्विूद उनहें भारत में रोके जाने से ्वे सहमत नहीं थे । उनहोंने इस संदर्भ में गांधरी िरी को पत् लिखकर अपना ल्वरोध वर्त किया था । आशचर्य है कि उस समय मुकसलमों करी आबादरी भारत करी कुल आबादरी करी लगभग 22 प्रतिशत थरी और उस बाइस प्रतिशत में से के्वल 14 प्रतिशत मुसलमान हरी पाकिसतान गए । उनमें से आठ प्रतिशत यहीं रह गए । इतनरी कम आबादरी के लिए अखंड भारत का इतना बड़ा भूभाग देने को अंबेडकर ने मूढ़ता का पर्याय बताने में संकोच नहीं करी थरी । इतना हरी नहीं उनहोंने इसलाम में महिलाओं करी ्वास्तविक कसथलत पर भरी ल्वसतृत प्रकाश डालते हुए बुर्का और हिज़ाब जैसरी प्रथाओं का मुखर ल्वरोध किया । उनका मानना था कि जहां हिंदू-समाज काल-ल्वशेष में प्रचलित रूढ़ियों के प्रति सुधारातमक दृकष््टकोण रखता है, ्वहीं मुकसलम समाज के भरीतर सुधारातमक आंदोलनों के प्रति के्वल उदासरीनता हरी नहीं, अपितु नकारातमकता देखरी जातरी है ।
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