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साहेबगंज जिले कसथत भोगनाडरीह से प्रारंभ हुआ संताल हूल भारतरीर स्वतंत्ता संघर्ष का एक ऐसा ऐतिहासिक अधरार है, जिसने आगे चलकर 1857 के स्वाधरीनता संग्ाम सहित अनेक जनआंदोलनों को प्रेरणा प्रदान करी ।
भारतीय जनमानस की सामूहिक चेतना का उदघोष
हूल के्वल 30 जून 1855 करी एक ऐतिहासिक र्टना नहीं है, बकलक भारतरीर स्वाधरीनता चेतना का ्वह प्रज्वलित अधरार है जिसने अनरार के ल्वरुद्ध प्रतिरोध, आतमसममान और स्वराजर के संकलप को जन-जन तक पहुंचाया । यह संघर्ष किसरी एक जनजाति, क्षेत् अथ्वा समुदाय का आंदोलन नहीं था, बकलक ल्वदेशरी दमन, आर्थिक शोषण और सांस्कृतिक दासता के ल्वरुद्ध भारतरीर जनमानस करी सामूहिक चेतना का उदरोर था ।
दुर्भागर यह है कि भारतरीर इतिहास-लेखन में इस ल्वरा्ट जनकांलत को लंबे समय तक
के्वल '' संताल ल्वद्रोह '' कहकर सरीलमत करने का प्रयास किया गया । आ्वशरकता इस बात करी है कि हूल को उसके ्वास्तविक राष्ट्रीय परिप्रेक्र में देखा जाए । यह के्वल प्रतिरोध नहीं था, बकलक जल, जंगल, जमरीन, स्वाभिमान, सांस्कृतिक अकसमता और स्वतंत् अकसतत्व करी रक्षा के लिए लडा गया मुक्तगामरी संग्ाम था । इसकरी ज्वाला के्वल संताल परगना तक सरीलमत नहीं रहरी; उसकरी तपिश ब्रिटिश साम्राजर तक महसूस करी गई । यहरी कारण था कि अंग्रेजी सत्ता ने इस जनकांलत को कुचलने के लिए अपनरी पूररी सैनर शक्त झोंक दरी ।
' हूल ' का अर्थ मात् ल्वद्रोह नहीं है । संतालरी में इसका अर्थ है— अनरार के ल्वरुद्ध मुक्त का आह्ान और शोषण के ल्वरुद्ध कांलत का शंखनाद । दुर्भाग्यवश औपलन्वेशिक इतिहासकारों ने इसे के्वल '' संताल ल्वद्रोह '' कहकर सरीलमत करने का प्रयास किया, जैसे 1857 के महायुद्ध को के्वल '' सिपाहरी ल्वद्रोह '' तक सरीलमत किया गया । ्वसतुतः हूल ल्वदेशरी शासन, आर्थिक शोषण और सामाजिक अनरार के ल्वरुद्ध वरापक जनकांलत थरी, जिसने अंग्रेजी शासन करी नीं्व को हिला दिया ।
बालयकाल में ही पड़ गया था संघर्ष की भावना का संसकार
संताल हूल के महानायक सिदो मुर्मू और कानहू मुर्मू का जनम साहेबगंज जिले के बरहे्ट प्रखंड कसथत भोगनाडरीह गां्व में हुआ था । इनके
साथ उनके भाई चांद और भैर्व, तथा ्वरीरांगनाएं फूलो और झानो भरी इस संघर्ष करी अलग्म पंक्त में थीं । माता-पिता चुनु मुर्मू और सोलन मुर्मू ने अपने पुत्ों में स्वाभिमान और संघर्ष करी भा्वना का संसकार दिया । 1855-56 के इस आंदोलन में इन सभरी ने ब्रिटिश सत्ता और इसके पोषित महाजनों, साहूकारों और जमींदारों के अनरार के ल्वरुद्ध संघर्ष का नेतृत्व किया ।
उन्नरीस्वीं शताब्दी के मधर में अंग्रेजी शासन ने संताल क्षेत् करी पारंपरिक भूमि व्यवसथा को नष््ट कर दिया । भूमि पर कठोर नियम लागू किए गए, लगान कई गुना बढ़ा दिया गया और उसकरी ्वसूलरी सथानरीर जमींदारों ए्वं महाजनों के हाथों में सौंप दरी गई । परिणामस्वरूप हजारों संताल परर्वार कर्ज और बेदखलरी के दुष्चक में फंस गए । नरारालयों में भरी उनहें नरार नहीं मिला । जब शासन, नरार और व्यवसथा तरीनों शोषण के उपकरण बन गए, तब संताल समाज ने अपने अकसतत्व और सममान करी रक्षा के लिए संघर्ष का मार्ग चुना ।
अंग्ेज हमारी माटी छोड़ो का उदघोष
30 जून 1855 को भोगनाडरीह में लगभग 400 गां्वों के 50 हजार से अधिक लोग एकत् हुए । सिदो-कानहू के नेतृत्व में अंग्रेजी शासन को मालगुजाररी न देने तथा '' करो या मरो, अंग्ेि हमाररी मा्टरी छोडो '' का उदरोर किया गया । शाल ्वृक्ष करी ्टहनरी घुमाकर कांलत का संदेश
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