Jankriti International Magazine / जनकृ सत अंतरराष्ट्रीय पसिका ISSN: 2454-2725
जगह बनाता हुआ लोहे की छड़ों वाली मखड़की के सामने मौजूद अपने मबस्तर तक पहुँचा, जहाँ मैंने अपने हाथ अपने मसर के पीछे रख मलए और पीठ के बल लेट कर अपनी आँखें मू ँद लीं । मुझे इस तरह लेटना पसंद था; सोए हुए आदमी को आप तंग नहीं कर सकते । और इस अवस्था में आप सोच सकते हैं और सपने देख सकते हैं ।
लेमकन मैं सपने नहीं देख सका । मेरा मचत्त अशांत था । बार-बार एम. के कहे शब्द मेरे कानों में गू ँज रहे थे । पर मैं अपने मवचारों की चचाा क्यों करूँ? अब भी कभी-कभी रात में मुझे उन मदनों के बारे में सपने आते हैं, और वे बेहद यंत्रिादायी होते हैं । शायद इस बात पर ध्यान मदया जाएगा मक आज तक मैंने बंदी-गृह में मबताए अपने जीवन के बारे में मलमखत रूप में शायद ही कभी कोई बात की है । पंद्रह वर्षा पूवा मैंने ' मृतकों का घर ' नामक मकताब एक ऐसे काल्पमनक व्यमक्त के चररत्र पर मलखी थी जो अपराधी था और मजसने अपनी पत्नी की हत्या की थी । यहाँ मैं यह बता दू ँ मक तब से बहुत सारे लोगों ने यह मान मलया है मक मुझे बंदी-गृह इसमलए भेजा गया क्योंमक मैंने ही अपनी पत्नी की हत्या कर दी थी!
अच्छी बात यह थी मक मैं अपने मज़े के मलए इन्हें लगातार सुधारता रहता ।
इस अवसर पर मकसी कारिवश मुझे अचानक अपने बचपन का एक अलमक्षत पल याद आया जब मैं नौ वर्षा का था । यह एक ऐसा पल था मजसके बारे में मुझे लगा था मक मैं इसे भूल चुका था । पर उस समय मुझे अपने बचपन की स्मृमतयों से मवशेर्ष लगाव था । मुझे गाँव में बने अपने घर में मबताए अगस्त माह की याद आई ।
वह एक शुष्ट्क, चमकीला मदन था जब तेज़, ठंडी हवा चल रही थी । गमी का मौसम अपने अंमतम चरि में था और जल्दी ही हमें मास्को चले जाना था, जहाँ ठंड के महीनों में हम फ़्रांसीसी भार्षा के पाठ याद करते हुए ऊब जाने वाले थे । इसमलए मुझे ग्रामीि इलाके में बने अपने घर को छोड़ने का बेहद अफ़सोस था । मैं मूसल से कू ट-पीट कर अनाज मनकालने वाली जगह के बगल से चलता हुआ गहरी, संकरी घाटी की ओर मनकल गया । वहाँ मैं घनी झामड़यों के झुरमुट तक गया मजसने उस संकरी घाटी को कौप्से तक ढँका हुआ था । मैं सीधा उन झामड़यों के बीच घुस गया, और वहाँ मुझे लगभग तीस मीटर दूर बीच की ख़ाली जगह में खेत को जोतता हुआ एक मकसान मदखा । मैं जानता था मक वह खड़ी ढलान वाली पहाड़ी पर जुताई कर रहा
धीरे-धीरे मैं भुलक्कड़पन की अवस्था में चला गया, और मफर यादों में डूब गया । बंदी-गृह में मबताए अपने पूरे चार साल के दौरान मैं लगातार अपने अतीत की घटनाओं को याद करता रहता, और
था, और उसके हाँफ़ते हुए घोड़े को बहुत प्रयास लगता था जैसे उन यादों के सहारे मैं अपना पूरा जीवन
करना पड़ रहा था । अपने घोड़े का हौसला बढ़ाने दोबारा जी रहा था । दरअसल ये स्मृमतयाँ खुद-ब-खुद
वाली मकसान की आवाज़ हर थोड़ी देर बाद तैरती हुई मेरे ज़हन में उमड़-घुमड़ आती थीं, मैं जान-बूझकर
मेरी ऊँ चाई तक पहुँच रही थी ।
इन्हें याद करने की कोमशश नहीं करता था । कभी- कभी मकसी अलमक्षत घटना से इनकी शुरुआत होती
मैं अपने इलाके में रहने वाले लगभग, और धीरे-धीरे ज़हन में इनकी पूरी जीवंत तसवीर बन सभी गुलाम मकसानों को जानता जाती । मैं इन छमवयों का मवश्लेर्षि करता, बहुत पहले
घटी मकसी घटना को नया रूप दे देता, और सबसे Vol. 3, issue 27-29, July-September 2017. वर्ष 3, अंक 27-29 जुलाई-सितंबर 2017