मारेय नाम का सकिान
Jankriti International Magazine / जनकृ सत अंतरराष्ट्रीय पसिका ISSN: 2454-2725
( अनूसदत रूिी कहानी)
मारेय नाम का सकिान
मूल कथाकार: फ़्योदोर दोस्तोयेव्स्की अनुिाद: िुिांत िुसप्रय
वह ईस्टर के हफ़्ते का दूसरा मदन था । हवा गमा थी, आकाश नीला था । सूरज गमााहट देता हुआ देर तक आकाश में चमक रहा था, पर मेरा अंतमान बेहद अवसाद-ग्रस्त था । टहलता हुआ मैं जेल की बैरकों के पीछे जा मनकला । सामान स्थानांतररत करने वाली मशीनों को मगनते हुए मैं बंदी-गृह की मज़बूत चारदीवारी को घूरता रहा । हालाँमक उनको मगनने का मेरा कोई इरादा नहीं था, पर यह मेरी आदत ज़रूर थी । बंदी-गृह में यह मेरी ' छु रट्टयों ' का दूसरा मदन था । आज बंमदयों को काम करने के मलए नहीं ले जाया गया था । बहुत सारे लोग ज़्यादा पी लेने के कारि नशे में थे । हर कोने से लगातार गाली-गलौज और लड़ने-झगड़ने की ऊँ ची आवाज़ें आ रही थीं । मबस्तरों के साथ बने चबूतरों पर ताश-पामटायों और बेहूदा, घमटया गानों का प्रबंध मकया गया था । महंसा में मलप्त होने की वजह से कई कै मदयों को उनके सहकममायों ने अधमरे होने तक पीटे जाने की सज़ा सुनाई थी । पूरी तरह ठीक हो जाने तक वे सभी भेड़ों की खालें लपेटे मबस्तरों पर मनढाल पड़े थे ।
तलाशी नहीं लेते थे, न वोदका की अवैध बोतलें ढूँढ़ मनकालने के मलए छान-बीन ही करते थे । उनका मानना था मक इन बमहष्ट्कृ त लोगों को भी साल में एकाध बार मौज-मस्ती करने की अनुममत ममलनी चामहए । यमद ऐसा नहीं हुआ तो मस्थमत और ख़राब हो सकती है । आमख़रकार मेरा मन इस मस्थमत के मवरुद्ध ग़ुस्से से भर उठा ।
इस बीच एम. नाम का एक राजनीमतक बंदी मुझे ममला । उसने मुझे मवर्षाद भरी आँखों से देखा । अचानक उसकी आँखों में एक चमक आई और उसके होठ
काँपे । " सब के सब डाकू-बदमाश हैं ", गुस्से से उसने कहा और आगे बढ़ गया । मैं बंदी-कक्ष में लौट आया, हालाँमक के वल पंद्रह ममनट पहले मैं दौड़कर यहाँ से बाहर मनकल गया था, जैसे मुझ पर पागलपन का दौरा पड़ा हो । दरअसल छह हट्टे-कट्टे बंदी नशे में धुत्त तातार गमज़न पर टूट पड़े थे । उसे नीचे दबा कर उन्होंने उसकी मपटाई शुरू कर दी थी । वे उसे मजस बेवकू फ़ाना ढंग से मार रहे थे उससे तो मकसी ऊँ ट की भी मौत हो सकती थी । पर वे जानते थे मक हरक्यूमलस जैसे इस तगड़े आदमी को मार पाना इतना आसान नहीं था । इसमलए वे उसे मबना मकसी संकोच या घबराहट के पीट रहे थे ।
अब वापस लौटने पर मैंने पाया मक सबसे दूर वाले कोने के मबस्तर पर गमज़न लगभग मबना मकसी जीवन के मचह्न के बेहोश पड़ा था । उसके ऊपर भेड़ की खाल डाल दी गई थी । सभी बंदी मबना कु छ बोले उसके चारो ओर से आ-जा रहे थे ।
लड़ाई-झगड़ों के दौरान यहाँ बात-बात पर चाकू-छु रे मनकल जाते थे । मपछले दो मदनों की छु रट्टयों के दौरान मुझे इन सब ने इतना उत्पीमड़त कर मदया मक मैं बीमार हो गया । नशेमड़यों का इतना ज़्यादा घृमित शोर-शराबा और इतनी अव्यवस्था मैं वाकई कभी हालाँमक उन सभी को पूरी उम्मीद थी मक अगली नहीं सह सकता था, मवशेर्ष कर के इस जगह पर । सुबह तक वह होश में आ जाएगा, पर यमद उसकी ऐसे मदनों के दौरान बंदी-गृह के अमधकारी भी बंदी- मकस्मत ख़राब रही होती तो यह भी सम्भव था मक गृह की कोई सुध नहीं लेते थे । इन मदनों वे यहाँ कोई इतनी मार खाने के बाद वह मर जाता । मैं मकसी तरह Vol. 3, issue 27-29, July-September 2017. वर्ष 3, अंक 27-29 जुलाई-सितंबर 2017