Jankriti International Magazine / जनकृ सत अंतरराष्ट्रीय पसिका ISSN: 2454-2725
पोर्षि मकया है क्योंमक इसकी माँ आप को बहुत रुपया देती है । इसकी माँ वेश्या है जो आप की छत पर बैठी है ।” 23 वह चाहकर भी उस दलदल से मनकल नहीं पा रही है । समाज उसे मनकले ही नहीं दे रहा है । श्यामा को वेश्या बनाने का मजम्मेदार कौन है? क्या वह स्वेच्छा से वेश्या बनने गयी थी?
‘ मबंदा महाराज’ कहानी का मुख्य पात्र मबंदा महजड़ा है । उसके अन्दर मानवीय व्यापकता और संवेदनशील हृदय की गहराई है लेमकन स्त्री-पुरुर्षेतर होने के कारि उसे उपेमक्षत जीवन व्यतीत करना पड़ता है । मबंदा महाराज जैसे तमाम स्त्री-पुरुर्षेतर व्यमक्त इस तरह के उपेमक्षत जीवन व्यतीत करते हैं । इन्हें सामान्य जीवन धारा से मबल्कु ल अलग करके देखा जाता है । क्या इस तरह के व्यमक्तयों की यही मनयमत है? क्या समाज द्वारा उपेमक्षत यह पात्र, अपनी इस मस्थमत के मलए स्वयं मजम्मेदार है? अगर नहीं, तो आमखरकार क्यों वह समाज में सामान्य जीवन जीने का अमधकारी नहीं है? क्यों समाज में अलग-थलग जीवन जीने के मलए मजबूर है? क्या हमारा समाज इतना क्रू र और मनमाम है मक प्रकृ मत प्रदत्त इस कमजोरी में उस व्यमक्त का साथ देने की जगह उपेमक्षत जीवन जीने के मलये मजबूर करें? जबमक इसमें उस व्यमक्त का कोई दोर्ष नहीं । मशवप्रसाद मसंह कहते हैं मक“ मैं उस उपेमक्षत जीवन को भी एक मूल्य देना चाहता था,
मजसके अन्दर पीड़ा का बोध, मानवीय पीड़ा को भी लाँघ जाता है । जो पुरुर्ष नहीं दे पाता, नारी नहीं दे पाती, वह एक महजड़ा दे जाता है ।” 24
मशवप्रसाद मसंह की कु छ कहामनयों में जैसे सँपेरा आमद को छोड़कर अंधमवश्वास का नकार मदखाई देता है । इस तरह की कहामनयों में‘ पापजीवी’,‘ कलंकी अवतार’,‘ कमानाशा की हार’ आमद हैं । मशवप्रसाद मसंह इस बात को अच्छी तरह समझ गये थे मक हमारे समाज में सामामजक, आमथाक शोर्षि से ज्यादा भयावह धाममाक शोर्षि होता है मजसमें व्यमक्त छटपटा भी नहीं सकता । जब तक व्यमक्त के अन्दर से ईश्वरीय डर, अंधमवश्वास आमद नहीं मनकलेगा, तब तक शोर्षि की जड़ें ऐसे ही मजबूती के साथ गरीबों का शोर्षि करेंगी । इसी मलए इनकी कहामनयों में ईश्वर, अन्धमवश्वास और अवतारी पुरुर्ष को प्रश्न मचह्न के कटघरे में लाकर खड़ा मकया है ।‘ कलंकी अवतार’ कहानी में रोपन सफे द घोड़े पर सवार व्यमक्त को देखता है तो उसे पुजारी की बातें याद आती हैं । कमलयुग में अत्याचाररयों के संहारक श्वेत घोड़े पर सवार कृ ष्ट्िकाय कांमत वाले भगवान‘ कलंकी अवतार’ लेंगे । उस अवतारी पुरुर्ष को देखकर रोपन की आँखों से झरझर आँसू मगरने लगता है । वह सोचता है मक आज अत्याचारी जमींदार भेदुमसंह के कु कमों की सजा ममल कर रहेगी । वह उस अवतारी पुरुर्ष के पीछे-
Vol. 3, issue 27-29, July-September 2017. वर्ष 3, अंक 27-29 जुलाई-सितंबर 2017