Jankriti International Magazine / जनकृ सत अंतरराष्ट्रीय पसिका ISSN: 2454-2725
उत्रमध्यकालीन प्रमुख सनगु कण िन्द्त िम्प्रदाय: िामान्द्य पररचय
डॉ ॰ अनुराधा िमाक सहायक प्रवक्ता, स्नातकोत्तर महन्दी मवभाग
डी ॰ ए ॰ वी ॰ महामवद्यालय अमृतसर ।
महन्दी सोमहत्येमतहास का मध्यकाल अत्यंत बृहद्, एवं सावािंमगक रूप से अमत महत्वपूिा काल है । इसकी सीमा-मनधाारि सम्वत् 1375 से सम्वत् 1900 तक मकया गया है । इस मवस्तृत काल के अध्ययन की सुमवधा हेतु सामहत्येमतहासकारों ने इसे दो भागों में मवभक्त मकया है । पूवा मध्यकाल( सम्वत् 1375 से 1700 तक) मजसे‘ भमक्तकाल‘ नाम से अमभमहत मकया गया है तथा उत्तर मध्यकाल( सं० 1700 से 1900) मजसे‘ रीमतकाल‘ काल नाम मदया है । इन नामकरि को काल मवशेर्ष की सवाप्रमुख प्रवृमत्त के आधार पर चुना गया है । इन दोनों कालों में मात्र‘ भमक्त‘, वं‘ रीमत‘ ही सवात्र व्याप्त नहीं थी अमपतु इन दोनों कालों में रामकाव्य, कृ ष्ट्िकाव्य, नीमतकाव्य, रीमतकाव्य, वीरकाव्य, एवं संतकाव्य की धाराएँ प्रवामहत होती रही हैं । उत्तरमध्यकाल में यद्यमप रस छन्द, अलंकार, नायक-नामयका भेद, गुि-दोर्ष, शब्द- शमक्तयों आमद का ही मनरूपि प्रमुख रूप से मकया गया है तद्यमप यह युग संतमत के मवस्तार का‘ स्विा युग‘ कहा जा सकता है, यमद सूक्ष्मतर ्टमसे से इस काल का अध्ययन मकया जाए, तो इस काल में संतमत के मवस्तार के साथ साम्प्रदामयक मनोवृमत्त का प्राधान्य भी ्टमसेगोचर होता है । मजस काल में 40 से ऊपर संत सम्प्रदाय ्टमसेगत होते हों उसे के वल रीमतकाल कहना समीचीन नहीं इसमलए, मैं इस काल को उत्तरमध्यकाल कहना ही उमचत समझती हूँ ।
भमक्त सदैव सगुि एवं मनगु ाि दोनों को साथ लेकर चली है, सन्तों ने प्रायः मनगु ाि भमक्त-पथ का ही अनुगमन मकया है, मनगु ाि से अमभप्राय है जो गुिों से मवहीन है यह गुि हैं-सत्व, रज् तम । मनगु ाि भमक्त से परिह्म का मनराकार रूप ही भमक्त का आलम्बन बनता है । जबमक सगुि भमक्त में मनराकार परिह्म को भक्त सगुि रूप देकर उसकी अचाना करते हैं उसका िह्म गुिों से युक्त हो कर अवतार धारि करता है, उनका यही अवतारी पुरुर्ष सगुि भमक्त का आधार बनता है । मनगु ाि मवचारधारा के अनुसार प्रत्येक प्रािी बुमद्ध तत्त्व, मनस तत्त्व, एवं आत्म तत्त्व स युक्त होता है परन्तु यह सब तत्त्व मूलतः मनराकार ही हैं मफर भी देहधारी कहकर मानव को साकार ही कहा जाता है, अतः मनगु ाि संतों का िह्म साकार भी है और मनराकार भी । महन्दी सामहत्य में इस मनगु ाि काव्यधारा का उद्भव आकमस्मक नहीं हुआ अमपतु इसकी, एक सुदीधा परम्परा रही है । उत्तर मध्यकाल में संतों ने मनगु ाि एवं सगुि दोनों रूपों में िह्म को अमभव्यंमजत मकया है, ज्ञान-योग-भमक्त की मत्रवेिी को इन मनगु ाि सन्तों ने अपने-अपने ्टमसेकोि से संवमधात कर सुप्त जनमानस को जागृत मकया है । इस काल में काव्य रूप की ्टमसे से‘ रीमतबद्ध,‘ रीमतमसद्ध एवं रीमतमुक्त तीनों वगों का प्रयोग देखा जा सकता है । परन्तु सन्तों ने काव्य का प्रियन सामहत्य में अपनी प्रमतष्ठापना हेतु नहीं मकया था । सन्तों ने न तो काव्य सम्बंधी तत्त्वों का अध्ययन कर उन्हें रचा अमपतु काव्य अत्यंत सहज रूप से प्रिीत मकया, संतों ने न अलंकारों का, न छंद का, न ही काव्य रूप का ध्यान रखा । अतः संतों के काव्य में बन्धन मवहीन रीमतमुक्त रूप ही ्टमसेगोचर होता है । संतों ने अपनी वािी को मकसी कलाकृ मत के रूप में सजाने का प्रयास नहीं मकया क्योंमक संत मकसी भी प्रकार के बाह्याडम्बरों में मवश्वास नहीं रखते थे । संत काव्य में सौन्दया का अभाव होते हुए भी उसके सहज
Vol. 3, issue 27-29, July-September 2017. वर्ष 3, अंक 27-29 जुलाई-सितंबर 2017