Jankriti International Magazine / जनकृ सत अंतरराष्ट्रीय पसिका ISSN: 2454-2725
इसी तरह‘ बुनने का समय’ कमवता में के दार
मलखते हैं – उठो झाड़न में मोजों में टाट में दररयों में दबे हुए धागों उठो उठो मक कहीं गलत हो गया है उठो मक इस दुमनया का सारा कपड़ा मफर से बुनना होगा 15 दुहराने की जरूरत नहीं मक के दार की आधुमनकता के मायने दुमनया को बेहतर बनाने के मलए तत्परता और समक्रयता में खोजना होगा । यही कारि है मक के दार की कमवता की आधुमनकता पमिन की जड़ आधुमनकता से अलग अपनी जमीन की जड़ों में है । बकौल के दारनाथ मसंह –“.. मैंने और मेरे बहुत-से समकालीन रचनाकारों ने अपने अध्ययन और अनुभव से मजस आधुमनकताबोध को अमजात मकया है, उसमें अपनी जड़ों से आई हुई स्मृमतयां और अमभप्राय भी चुपचाप शाममल हो गए हैं । इससे अमजात बोध को एक प्रामामिकता ममलती है, जहाँ रचना अपना पांव मटकाकर खड़ी होती है ।” 16
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के दार की संवेदना की एक खामसयत यह है मक उस वगा के साथ है जो समदयों से वंमचत हैं, संघर्षारत हैं, कमारत हैं और अपनी असीम ऊज ा की बदौलत पृथ्वी के भार को अपने कं धे पर थामे हुए हैं । इस तरह का बोध छायावादी कमवता में हमें मनराला को छोड़कर बहुत कम ममलता है । बाद के कमवयों में मजस तरह की मनर्षेधवादी प्रवृमत पैदा हुई, और जामहर है मक वह प्रवृमत पमिमी आधुमनकता के अंधानुकरि का प्रमतफल थी, उसने कमवता का भला तो नहीं ही
मकया, उनके सामामजक सरोकार पर भी एक बड़ा और अथापूिा प्रश्नमचन्ह लटका हुआ है । यह साठ के दशक में शुरू हुआ मनर्षेधवाद है, मजसके अनुवती कई काव्यान्दोलन भी हैं जो समय के साथ उभर कर लुप्त हो जाने वाले थे । के दार इस तरह की‘ मनगेमटमवटी’ से खुद को बचा ले जाते हैं । धुममल का‘ लाउडनेस’ भी उनके अंदर नहीं है और रघुवीर सहाय की तरह का दुहरावपन भी नहीं, मुमक्तबोध का रास्ता भी उनसे साफ-साफ अलग मदखाई पड़ता है । के दार अपने समकालीन कमवयों में एक नई भार्षा की ऊज ा और एक अमद्वतीय सरोकार लेकर आते हैं । इसका तात्पया यह कतई नहीं लगाया जाय मक उनके समकालीन कमवयों के सरोकार जनमानस से अलग मकसी मभन्न वस्तु पर मटका हुआ है – लेमकन के दार उस सरोकार को खुद के सरोकार में ढालकर मफर उसे कमवता में प्रस्तुत करते हैं । इसमलए के दार अपनी बात कहते हुए भी अपने आस-पास के लोगों की बात कहते हुए लगते हैं । कु छ इस तरह मक जैसे वे खुद वही हो जाते हैं अपनी कमवता में, मजनके सरोकारों पर वह कमवता मलख रहे होते हैं । मबल्कु ल प्रमसद्ध जमान कमव गाटफ्रीड बेन की इन पंमक्तयों की तरह मक‘ यमद तुम अपने आप को वस्तुओं से स्वंतंत्र कर लोगे तो तुम्हें एक रंगहीन मनयमत का सामना करना पड़ेगा ।’ 17 जामहर है मक के दार शुरू से अंत तक इन पंमक्तयों को ध्यान में रखते हैं । वे हर क्षि महसूस करते हैं मक वे वस्तुओंके एक मवशाल जंगल में साँस ले रहे हैं । मक यह वस्तुओं का जंगल गाँव, खेत-बधार, कस्बा, शहर से लेकर मवदेश की धरती तक फै ला हुआ है, जो के दार की कमवता के मलए जरूरी सामग्री है, और उनकी संवेदना इन तामाम वस्तुओंके प्रमत है । यह एक बड़ी मवशेर्षता है के दार जी के आधुमनकताबोध की जो उनके समकालीन कमवयों से उन्हें अलग करती है, उन्हें मवमशसे बनाती है ।‘ माँझी का पुल’ और उसमें आए
Vol. 3, issue 27-29, July-September 2017. वर्ष 3, अंक 27-29 जुलाई-सितंबर 2017