Jankriti International Magazine / जनकृ सत अंतरराष्ट्रीय पसिका ISSN: 2454-2725
इनकी कमवताओं में मदखायी पड़ती है । इसी तरह के कु छ उदाहरि मवश्वनाथ प्रसाद मतवारी ने एक लेख में मदए हैं, यहाँ उन कमवताओं को देखा जा सकता है – मुिी में प्रश्न मलए दौड़ रहा हूँ वन-वन पवात-पवात लाचार.. 5 xx xx जाने कहाँ कौन पवात है मजनसे रोज लुढ़ककर मेरे पास चला आता है नीला पत्थर जब मैं कभी अके ला बहुत अके ला होता हूँ । 6
हैं
या‘ हम जो सोचते हैं’ कमवता में वे मलखते
हर जेब के भीतर कु छ दबे-दबे फू ल हैं और हर फू ल के नीचे एक मरी हुई भार्षा मजसे सूरज समझता है... समुद्र वहाँ नहीं है वहाँ मदन के सतरंगे घोड़े उतरते हैं वह हमारे आस-पास हमारी छाती में हमारे बंद पन्नों के भीतर है जहाँ रात के सन्नाटे में हम सोचते-से रहते हैं । 7
उपरोक्त कमवताओं में कमव के अंदर अके लापन, उदासी और बेचैनी के जो ्टश्य हैं वे पमिम के आधुमनक कमवयों की याद मदलाते हैं । आधुमनकता की एक खास मवशेर्षता अके लापन और उदासी भी है । यमद इसे नाकारात्मक अथा में न मलया जाय तो यह व्यमक्त का स्वयं से साक्षात्कार है, उसके जो अपने दुख हैं, उसके नजदीक जाकर उससे बोलना-बमतयाना है । के दार इन कमवताओं में खुद के अंदर समामहत होकर अपने छोटे-छोटे दुखों से साक्षात्कार करते हुए मदखायी पड़ते हैं । नन्हें गुलाब को रोपने की आकांक्षा कमव को‘ मैं’ तक ले जाती है, और वही‘ मैं’ उसे अपने व्यमक्त के अंदर प्रवेश कर खुद को पड़ताल करने का रास्ता बताता है । और यह खुद के अंदर प्रवेश करना नाकारात्मक तो कतई नहीं, यहाँ से एक और रास्ता खुलता है । कमव के ही शब्दों में – और एक सुबह मैं उठूँगा मैं उठूँगा पृथ्वी-समेत जल और कच्छप-समेत उठूँगा मैं उठूंगा और चल दू ँगा उससे ममलने मजससे वादा है मक ममलू ँगा । 8 के दार जब‘ मैं’ मक तरफ जाते हैं तो नई ऊज ा के साथ लौटते भी हैं, उनकी यह मवशेर्षता ही उन्हें अमद्वतीय बनाती है । इस तरह वे अपने पाठकों को वहाँ ले जाना चाहते हैं, जहाँ सृजनात्मक ऊजाा के द्वार हैं, कटु यथाथा है और है जीने की एक अदम्य लालसा, मजनके मबना यह जीवन लगभग बेमानी है – मैं आपको मसफा आमंमत्रत करूं गा मक आप आएं और मेर साथ सीधे उस आग तक चलें उस चूल्हे तक-जहाँ वह पक रही है एक अद्भुद ताप और गररमा के साथ
Vol. 3, issue 27-29, July-September 2017. वर्ष 3, अंक 27-29 जुलाई-सितंबर 2017