Jankriti International Magazine / जनकृ सत अंतरराष्ट्रीय पसिका ISSN: 2454-2725
उनका अपना अनुभव है । के दार की आधुमनकता को इसीमलए‘ ठेठ भारतीय आधुमनकता’ के संदभा में ही समझना और समझाना उमचत होगा । बकौल के दार जी –“ मेरी आधुमनकता में मेरे गाँव और शहर के बीच का संबंध मकस तरह घमटत होता है, इस प्रश्न की मवकलता मेरे भाव-बोध का एक अमनवाया महस्सा है । ये दोनों मेरे भीतर हैं और दोनों में जो एक चुपचाप सहअमस्तत्व है, उसका संतुलन हमेशा एक-जैसा बना रहता हो, ऐसा नहीं है । इससे भारतीय कमव के भीतर एक नए ढंग का भाव-बोध पैदा होता है, जो पमिम से काफी मभन्न है ।” 2 यहाँ डॉ. श्यामसु ंदर दास की बातों का उल्लेख करना भी अप्रासंमगक न होगा –“ पमिमी व्यमक्त की मनयमत हमारी मनयमत मबलकु ल नहीं बन सकती । उसके यहाँ के अमानवीयपूिा अजनबीपन से उत्पन्न जीवन मवरोधी तत्व हमारे मलए प्रासंमगक नहीं हो सकते । हम अपनी ही जमीन से नए की तलाश करके आधुमनक बनने की कोमशश को इस संदभा में सही मानने को तैयार हैं । हमारा यथाथा अनेक मायनों में पमिमी दुमनया के यथाथा से एकदम मभन्न है ।” 3
आशय यह मक के दार की आधुमनकता को समझने के मलए पमिम की आधुमनकता के‘ टूल’ कई बार बेमानी सामबत हो सकते हैं, इसमलए यहाँ हम उनकी कमवताओंकी माफा त उनकी आधुमनकता और उनके बोध को समझने का प्रयास करेंगे ।
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के दार की कई कमवताएँ एक साथ पहली बार अज्ञेय के संपादन में मनकलने वाले‘ तारसप्तक’ में प्रकामशत हुई, ं तभी से यह कमव एक नए भावबोध के कमव के रूप में जाना-पहचाना जाने लगा । इससे पहले भी जब के दार की कमवताएँ लयबद्ध गीत के रूप में होती थी, तब भी उनके अंदर एक नए भावबोध की झलक ममलनी शुरू हो गई थी । लेमकन‘ अभी
मबल्कु ल अभी’ में कमव का वह नूतन रूप मुखर होता है । कमव ने इस संग्रह में‘ मैं’ की चेतना की पहचान की है । लेमकन यह ध्यान देने लायक बात है मक यह‘ मैं’ उसका व्यमक्त में सीममत न होकर नई संवेदना का आधार खड़ा करने के मलए उत्सुक मदखायी पड़ता है । आधुमनकता ने व्यमक्त की स्वकीय सत्ता और उसकी अमस्मता को स्थामपत करने की पहल की । पुरानी परम्पराएं व्यमक्त को एक समामजक उपकरि समझती थीं, वहाँ व्यमक्त के‘ स्व’ की पहचान मतरोमहत थी । आधुमनकताबोध ने पहली बार‘ स्व’ का दरवाजा खोला, फलतः व्यमक्त की सत्ता स्थामपत हुई, यह‘ मैं’ की सत्ता हमें महन्दी कमवता में मनराला और अन्य छायावादी कमवयों में भी मदखायी पड़ती है, लेमकन यही‘ मैं’ 50 के दशक के बाद जब के दार के यहाँ आता है तो एक मभन्न भार्षा और संवेदना के साथ – छोटे से आँगन में माँ ने लगाए हैं तुलसी के मबरवे दो मपता ने लगाया है बरगद छतनार
मैं अपना नन्हा गुलाब कहाँ रोप दू! ं 4 इस कमवता में नन्हा गुलाब रोपने की जो आकांक्षा है, उसं‘ मैं’ की चेतना कहा जा सकता है । लेमकन इस आकांक्षा के पीछे एक मवद्रोह भी है । वह मवद्रोह है परम्परा के प्रमत । तुलसी और बरगद भारतीय परम्परा के प्रतीक समझे जायं, तो उन परम्पाराओं के बरक्श कमव नन्हे गुलाब के रूप में अपनी एक नूतन चेतना को स्थामपत करने का आकांक्षी है । यह आकांक्षा‘ मैं’ से उत्पन्न जरूर होती है, लेमकन इसके गहरे सामामजक सरोकार से इनकार नहीं मकया जा सकता । यह है के दार की अपनी आधुमनकता जो
Vol. 3, issue 27-29, July-September 2017. वर्ष 3, अंक 27-29 जुलाई-सितंबर 2017