Jankriti International Magazine Jankriti Issue 27-29, july-spetember 2017 | Page 315

Jankriti International Magazine / जनकृ सत अंतरराष्ट्रीय पसिका ISSN: 2454-2725
मनवहान नहीं कर पाते हैं । इस संदभा में आशीर्ष नंदी मलखते हैं-“ संसद में टीवी और मफल्मी दुमनया से आये लोगों की संख्या भी मपछले मदनों काफी बढ़ी है । मशहूर मखलाड़ी, मवज्ञान के प्रबंधक, प्रचार-लोभी कलाकार और ऐसे ही कई गौर-राजनीमतक लोग, राजनीमत की बाजारू संस्कृ मत को गढ़ने में योगदान दे रहे हैं । यही लोग जनता की राय को उत्तरोत्तर अमस्थर करने के कारक भी बनते हैं ।” 3
राजनीमतक दलों का लक्ष्य देश का सवािंगीि मवकास नहीं रह गया है । राजनीमतक दलों में कई तरह की संकीिाताएं भर गई हैं । सत्ता को येन के न प्रकारेि हामसल करना और बचाये रखना ही इनका प्रमुख उद्देश्य बन गया है । राजनीमत के इस आयाम पर श्यामाचरि दुबे कहते हैं-“ राष्ट्रीयता, सामामजक एकीकरि, मवकास, आत्ममनभारता और समता के लक्ष्य आज अथाहीन हो गए हैं, क्योंमक तात्कामलक राजनीमतक लाभ के मलए उनकी पररभार्षाएं बदली हैं । अवसरवादी राजनीमत ने जातीय भावना, क्षेत्रीयता, भार्षावाद, सांप्रदामयकता और जामतवाद का बड़ी बेशमी से दोहन मकया है । इस ्टमसे से हमारा कोई भी दल बेदाग नहीं है ।” 4 उदय प्रकाश की कथा ्टमसे समसाममयक राजनीमतक मन और मंशा को सहजता से भांप लेती है ।
अयोध्या में मंमदर ममस्जद मववाद से पूरे देश का एक अतामका क, अमानवीय और डरावना ध्रुवीकरि पौदा हो रहा था ।” 5 कहना न होगा उदय प्रकाश का डर सही सामबत हुआ और मदसंबर 1992 ई. में ममस्जद ध्वंस के बाद देश भर में सांप्रदामयक तनाव अनेक मदनों तक कायम रहा ।
जामतयों का राजनीमतकरि इस दौर के राजनीमतक परर्टश्य की दूसरी प्रमुख प्रवृमत्त है । इसकी शुरुआत दमलतों के साथ-साथ मपछड़ी जामतयों को नौकररयों और मशक्षि संस्थानों में आरक्षि हेतु मंडल आयोग की मसफाररस लागू होने से मानी जा सकती है । इस दौरान दमलत और मपछड़ी जामतयों का जबरदस्त राजनीमतक उभार हुआ । इन वगों के लोगों का उत्साह मतदान से लेकर राजनीमतक दलों का सदस्य बनने तक सभी राजनीमतक गमतमवमधयों में मदखाई देता है । इस उभार का भारतीय समाज पर कोई खास सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ा । योगेन्द्र यादव जैसे राजनीमतक मचंतक का मानना है मक“ दमलतों और मपछड़ों के फलस्वरूप जो आस्थाएं राजनीमत के कें द्र में आयी, अपने चररत्र में वे प्रायः सबको जोड़नेवाली न होकर खंमडत थी । उनकी मचंताएं अक्सर एक वगा और एक मुद्दे को लेकर रहती थी ।” 6 इन राजनीमतक दलों ने कभी यह प्रयास नहीं मकया मक मपछड़ों, अनुसूमचत जामतयों, अनुसूमचत जनजामतयों तथा अन्य दमलत वगों के साथ तालमेल मबठाकर सभी के सवािंगीि मवकास का एजेंडा अपनाया जाए । सरकार गठन में इन वगों की भूममका अब नजरअंदाज नहीं की जा सकती । इस संबंध में धीरुभाई शेठ कहते हैं-“ कांग्रेस, भाजपा और कम्युमनस्ट सरीखे राष्ट्रीय दलों का राजनीमतक समथान प्राप्त करने के मलए अन्य मपछड़े वगों, अनुसूमचत जामतयों या जनजामतयों के सामामजक-राजनीमतक संगठनों या इनके द्वारा गमठत क्षेत्रजामत-दलों के साथ सीधी बातचीत करना
सांप्रदामयकता आज के राजनीमतक परर्टश्य की एक प्रमुख प्रवृमत्त है । इसका बारीक वृत्तांत उदय प्रकाश की कथासृमसे में भयावह यथाथा के साथ मौजूद है । वर्षा 1992 में हंस के अगस्त और मसतंबर अंक में...‘ और अंत में प्राथाना’ कहानी का प्रकाशन होता है । इसमें उदय प्रकाश मलखते हैं-“ ये वे मदन थे जब मध्य प्रदेश ही नहीं देश के अन्य तीन राज्यों में भारतीय जनता पाटी की सरकार बन गई थी । डीजल से चलने वाले रक के ऊपर रखे गए रथ के मॉडल के साथ एक बूढ़े
राजनीमतक महंदू नेता ने देश भर में रथ यात्रा की थी । Vol. 3, issue 27-29, July-September 2017. वर्ष 3, अंक 27-29 जुलाई-सितंबर 2017