Jankriti International Magazine / जनकृ सत अंतरराष्ट्रीय पसिका ISSN: 2454-2725
मकान कमवता के जररये धूममल ने टूटते हुए स्वप्नों, गरीबी, घुटन का जीवंत मचत्रि मकया है । धूममल अक्सर ऐसे मकानों की बात करते हैं मजनकी छतें कबूतर की बीट से मैली हो गयी है, मजनके आँगन में धूप कभी नहीं जाती, मजनके शौचालयों में खासी मकवाड़ों की काम करती है । जहाँ बूढ़े और जवान लड़मकयाँ खाना खाने के बाद अंधे हो जाते हैं, बच्चे अंगूठा चूसते हैं और नौजवान लोग रोजगार के मलए दफ्तरों का चक्कर काटते हैं । ऐसे मकानों की आड़ में ऐसे लोग भी रहते हैं जो दूसरों को नमक की ढेले की तरह गला देते हैं । मकान जब कमरा बनता है यानी गरीब आदमी जब थोड़ा ऊपर उठने की कोमशश करता है तब उसकी हत्या कर दी जाती है ।
धूममल के बारे में यह माना जाता है मक, जब राजकमल चौधरी की मृत्यु हुई तब धूममल ने जीवन की अनेक मवसंगमतयों, मवड़म्बनाओंको भार्षा के नये मुहावरे में ढालने का प्रयास मकया । कमवयों और कमवताओं पर भी उन्होंने मवमशा मकया है-“ मकान / मारे गये आदमी के नाम पर / छतों की सामज़श है जहाँ रात / ररश्तों की आड़ में / पशुओं को पालतू बनाती है ।” 12
2.5.‘ पिकथा’-
पटकथा धूममल की कमवताओं में सबसे लंबी कमवता है ।‘ संसद से सड़क तक’ की यह अंमतम कमवता लगभग 30 पृष्ठों में फै ली हुई है । सन् 47 से लेकर 70-71 तक का समय भारतीय राजनीमत के मलए, सामामजक जीवन के मलए बहुत दु: ख-पूिा समय था । या यू ँ कहे तो यह दौर नैमतक मूल्यों का ह्रास का समय था । इस कमवता को पढ़कर लगता है मक, यह मुमक्तबोध की कमवता का मवस्तार है । जैसे-“ जब मैं बाहर आया / मेरे हाथों में / एक कमवता थी और मदमाग में / आँतों का एक्स-रे ।” 13
‘ मैं’ जो काव्य नायक है, वह बाहर आता है जहाँ हवा है, धूप है, घास है लेमकन उसे वास्तमवक सुकू न आजादी से ममलती है । कमवता के एक बड़े भाग में कमव का उल्लास और उत्साह मदखाई पड़ता है । कमवता में इस व्यमक्तगत उल्लास के साथ आजादी के बाद राजनीमत में बनावटी उल्लास देखने लायक है । आगे चलकर कमव का भ्रम टूट जाता है । अन्य देशवामसयों की तरह स्वतंत्रता को लेकर कमव ने जो सपने संजोये थे वे एक-एक कर टूटने लगता है । काव्य नायक यह महसूस करता है मक जनता त्याग, संस्कृ मत और मनुष्ट्यता यह सारे भारी भरकम शब्द मात्र हैं । धीरे-धीरे कमवता के‘ मैं’ को यह समझ में आ जाती है मक कथनी और करनी में मकतना बड़ा फ़ासला होता है । तभी तो धूममल कहते हैं-“ मैं इंतजार करता रहा.../ इंतजार करता रहा.../ इंतजार करता रहा.../ जनतंत्र, त्याग, स्वतंत्रता.../ संस्कृ मत, शांमत, मनुष्ट्यता.../ ये सारे शब्द थे / सुनहरे वादे थे / खुशफहम इरादे थे ।” 14
धूममल काव्य नायक द्वारा उस युद्ध की ओर इशारा कर रहे हैं जो नये-नये स्वतंत्र हुए देश को एक भयानक युद्ध की ओर ढके ल रहा था । मबना काम मकये लाभ पाने की तकनीक का मवकास हो चुका था । मजसे देख काव्य नायक का मोहभंग हो जाता है-“ मैंने अचरज से देखा मक दुमनया का / सबसे बड़ा बौद्ध-मठ / बारूद का सबसे बड़ा गोदाम है ।” 15
कमवता के माफा त धूममल यहाँ कहना चाहते हैं मक, जनता ने यह कभी नहीं सोचा था की नेता उसके आस-पास एक अंधा कु आँ का मनमााि करते जा रहे हैं और उसके मनगाहों की रोशनी छीनती जा रही है जो उसे परावलम्बी और पंगु बनाती जा रही है-“ गोदाम अनाज से भरे पड़े थे और लोग / भूखों मर रहे थे... सहानुभूमत और प्यार / अब ऐसा छलावा है मजसके जररये / एक आदमी दूसरे को, अके ले / अंधेरे
Vol. 3, issue 27-29, July-September 2017. वर्ष 3, अंक 27-29 जुलाई-सितंबर 2017