Jankriti International Magazine / जनकृ सत अंतरराष्ट्रीय पसिका ISSN: 2454-2725
प्रेमचंद के मलए सवाामधक श्रेयस् कर जीवन-शैली है । ग्रामीि मनुष्ट्य इतने सीधे-सादे और सरल हृदय होते हैं मक मनुष्ट्य के प्रमत उनकी संवेदना और सहानुभूमत तो अपार रहती ही है, पशुओं के मलए भी उनके मन में भाईचारगी और प्रेम कू ट-कू टकर भरा होता है ।
होरी को अपने संपूिा जीवन में एक ही कामना थी मक उसके द्वार पर गाय बंधी रहे और लोग उसके द्वार को देखकर उसके घर को होरी महतो का घर कहें । मकं तु यह गाय लेने के मलए उसके पास बैंक से लोन लेने की जानकारी या साहस नहीं है । मकं तु महाजनों से जो उसके आस-पास रहते हैं उनसे उधार लेने में उसे कोई तकलीफ नहीं है । भोला की गाय देखकर होरी का मन ललचा जाता है ।‘‘ वह आगे वाली गाय उसे दे दे तो क् या कहना । रुपये आगे-पीछे देता रहेगा । वह जानता था, घर में रुपये नहीं हैं । अभी तक लगान नहीं चुकाया जा सका, मबसेसर साह का देना भी बाकी है, मजस पर आने रुपये का सूद चढ़ रहा है, लेमकन दररद्रता में जो एक प्रकार की अदूरदमशाता होती है, वह मनलाज् जता जो तकाजे, गाली और मार से भी भयभीत नहीं होती, उसने उसे प्रोत् सामहत मकया । बरसों से जो साध मन को आंदोमलत कर रही थी, उसने उसे मवचमलत कर मदया ।‘‘ महाजन और मकसान के बीच में गामलयों और तकाजों का संबंध है, उसने होरी को मनमिंत कर मदया है । होरी जानता है मक गाय लेकर भोला के रुपये वह चुका नहीं पाएगा मकं तु मफर भी वह इस इच् छा को दबा नहीं पाता क् योंमक वह यह भी जानता है मक जैसी मस्थमत अभी है वैसी मस्थमत उसके साथ मजंदगी भर रहेगी, इसमें सुधार होने की संभावना नहीं है । अत: जहां दो गामलयां खाते हैं, वहां चार गामलयां और सही मकं तु साध तो पूरी हो जाएगी ।
मजसे कभी-कभी ही सुख से साबका पड़े । वह धमनया इतनी बड़ी खुशी देखकर भी खुश नहीं हो पाती । उसे भय है मक कहीं भगवान इसे छीन न ले ।‘‘ धमनया अपने हामदाक उल् लास को दबाए रखना चाहती थी । इतनी बड़ी संपदा अपने साथ कोई नई बाधा न लाए, यह शंका उसके मनराश हृदय में कं पन डाल रही थी । आकाश की ओर देखकर बोली –‘‘ गाय के आने का आनंद तो जब है मक उसका पौरा भी अच् छा हो । भगवान के मन की बात है । मानो वह भगवान को भी धोखा देना चाहती थी । भगवान को भी मदखाना चाहती थी मक इस गाय के आने से उसे इतना आनंद नहीं हुआ मक ईष्ट्यालु भगवान सुख का पलड़ा ऊं चा करने के मलए कोई नयी मवपमत्त न भेज दे ।’’
गाय की यह अमभलार्षा इतनी तीव्र है मक साम-दाम-दंड-भेद हर नीमत अपनाकर जब गाय घर आ जाती है तो उसका मकसा तरह ख् याल रखा जाता है – खुद खाएं या न खाएं पर गाय को माता का दजाा दे, उसे भूखा नहीं रखा जाता । खुद रूखा-सूखा मनगल सकते हैं पर गाय को मबना खली-चोकर के खाली भूसा कै से मदया जा सकता है । अपनी गाय के मरने पर धमनया का प्रेम ही उसके प्रमत ये शब् द कहलवाता है –‘‘ इतनी जल् दी सबको पहचान गई थी मक मालूम ही न होता था मक बाहर से आई है । बच् चे इसके सींगों से खेलते थे । मसर तक न महलाती थी । जो कु छ मांद में डाल दो, चाट-पोंछकर साफ कर देती थी । लच् छमी थी, अभागों के घर क् या रहती । सोना और रूपा यह हलचल सुनकर जाग गई थीं और मबलख-मबलखकर रो रही थीं । उसकी सेवा का भार अमधकतर उन् हीं दोनों पर था । उनकी संमगनी हो गई थी । दोनों खाकर उठती तो एक-एक टुकड़ा रोटी उसे अपने हाथों से मखलाती । कै सा जीभ मनकालकर खा लेती ।’’
गाय की अमभलार्षा होरी और धमनया दोनों |
की मचर-संमचत अमभलार्षा थी । जब गोबर गाय लाता |
इन गरीब मकसानों के पास धन नहीं है मकं तु |
है तो‘‘ धमनया के मुख पर जवानी चमक उठी थी ।’’ |
उनके मदल इतने बड़े हैं मक एक गाय, एक बैल या एक |
Vol. 3, issue 27-29, July-September 2017. |
वर्ष 3, अंक 27-29 जुलाई-सितंबर 2017 |