Jankriti International Magazine / जनकृ सत अंतरराष्ट्रीय पसिका ISSN: 2454-2725
जाता । यहां गरीब, मोची, पासी, चमार, धोबी, मजदूर, मकसान, खेमतहर, मभखारी हैं तो यहां जमींदार, लेखक, संपादक, मवद्वान, शास् त्री और पंमडत भी हैं । यहां कायर, नीच, लालची, स् वाथी और कं जूस हैं तो यहां दयालु, भावुक, उदार, परोपकारी और दानी भी हैं । इन पात्रों की प्रासंमगकता आज लुप् त नहीं हुई है । आज भी इन पात्रों को हम अपने आस-पास देखते हैं । प्रेमचंद के ये पात्र भले ही अपनी कथा में मसफा अपने जैसा एक है, मकं तु वह अपने पूरे वगा का प्रमतमनमध भी बन जाता है क् योंमक प्रेमचंद उसके माध् यम से उस पूरे समाज को, समाज के उस वगा को और उस वगा के प्रत् येक अंग को व् यक् त करते हैं । इन पात्रों की साथाकता इस बात में नहीं है मक ये प्रेमचंद द्वारा अपनी कथा में उपयुक् त हैं, मफट हैं या अमद्वतीय हैं, बमल्क इनकी साथाकता इस बात में है मक ये अपनी असाधारिता में भी अत् यंत साधारि, अपनी मवमशसेता में भी अत् यंत सामान् य के प्रतीक बन जाते हैं,‘‘ इसीमलए, मबना मकसी अमतशयोमक्त के यह कहा जा सकता है मक प्रेमचंद-सामहत् य में संपूिा भारतीय जनता, अपने सच् चे रूप में अमभव् यक् त हुई है । परंपरागत अंधमवश् वासों और नैमतक आडंबरों को जीतती हुई, भय, आतंक, दमन के मपशाच को कु चलती हुई, अपनी प्रखर प्रमतभा, अथक मेहनत व संकल् प, मनष्ट्कपट-सहृदयता, सच् चाई की टेक, अमतशय सरस- कोमलता, ईमानदारी, भमवष्ट्य में अटूट आशा, करुिा, दया, प्रेम, वात् सलय और भ्रातृत् व के साथ देश की समस् त सांस् कृ मतक मवरासत को अपनी गोदी में मलए, भरतीय जनता के चरि प्रगमत के पथ पर आगे बढ़ रहे हैं ।
प्रत् येक पात्र का मनमााि प्रेमचंद ने मवमभन् न मूल् य-्टमसेयों को नजर में रखते हुए मकया है, मकं तु मूलत: इन पात्रों के मनम ाि का उद्देश् य मसफा एक है और वह है मानवता का उन् नयन और पामश्वकता का
दमन । अपने इसी उद्देश् य की पूमता के मलए उन् होंने सैकड़ों पात्रों को मसरजा है, उन् हें मवचार मदया है, आवाज दी है और उन् हें अपने सामहत् य का अंग बनाया है ।
प्रेमचंद सामहत् य में जहां मानव जीवन की सूक्ष्म बारीमकयों का मववेचन-मवश् लेर्षि ममलता है, वहीं उनके सामहत् य में मानवेतर जीवों के अन् यतम रूप के दशान भी होते हैं । उनकी कहामनयों और उनके उपन् यासों में पशुओं के प्रमत संवेदना का मचत्रि तो है ही,‘ पशुओंकी संवेदना’ का भी बड़ा ही सटीक और हृदयग्राही मचत्रि ममलता है । मानवेतर जीव प्रेमचंद के सामहत् य में मदखाने के मलए या मनोरंजन के मलए नहीं आते बमल्क उनके माध् यम से भी बहुधा प्रेमचंद अपनी सामहमत्यक उपयोमगताओंकी मसमद्ध करते नजर आते हैं ।
ग्राम् य जीवन और कृ मर्ष का अधार ही होता है पशु-पालन । मकसान और गाय-बैल-बकरी एक- दूसरे के पूरक होते हैं । मकसानों और पशुओं का यह प्रेम प्रेमचंद-सामहत् य में अपने उच् चतम और मवशुद्ध रूप में ममलता है ।
प्रेमचंद ने हमेशा एक सपना देखा था । वे मशीन युग के पररिाम इस मशीनी जीवन से नाखुश थे । वे संपूिा जीवन गांव में रहकर जीवन-यापन करने का सपना देखते हैं मकं तु उसे साकार न कर पाए । प्रेमचंद पाश् चात् य सभ् यता के मूल मशीन तथा धन और शहरीकरि से बहुत मनराश थे । उनकी नजर में जीवन जीने का सबसे ऊं चा तरीका गांवों का सीधा- सादा जीवन है । आज आधुमनक युग में शहरीकरि और मशीनों की आपाधापी ने मनुष्ट्य को भी मशीन बना मदया है, उसकी संवेदनाएं मशीनों की आवाज के नीचे दब गई हैं, ऐसे में गांव का वह रमिीय वातावरि जो मनुष्ट्य की सोई हुई संवेदनाओंको जगा सकता है,
Vol. 3, issue 27-29, July-September 2017. वर्ष 3, अंक 27-29 जुलाई-सितंबर 2017