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नेता तकनीकी रूप से संविधान का दुरुप्योग कर सकते हैं । इसवल्ये ऐसे सुरक्षा उपा्य आवश्यक हैं । इससे पता चिलता है कि वह जानते थे कि संविधान लागू होने के बाद भारत को किन व्यावहारिक कठिनाइ्यों का सामना करना पड़ सकता है ।
संवैधानिक नैतिकता: बाबासाहेब आंबेडकर के परिप्रेक््य में संवैधानिक नैतिकता का अर्थ विभिन्न लोगों के परसपर विरोधी हितों और प्रशासनिक सह्योग के बीचि प्रभावी समन्वय होगा । उनके अनुसार, भारत को जहाँ समाज में जाति, धर्म, भाषा और अन्य कारकों के आधार पर विभाजित वक्या ग्या है, एक सामान्य नैतिक विसतार की आवश्यकता है तथा संविधान उस विसतार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है ।
लोकतंत्: उनहें लोकतंत् पर पूरा भरोसा था । उनका मानना था कि जो तानाशाही तवरित परिणाम दे सकती है वह सरकार का मान्य रूप नहीं हो सकती है । लोकतंत् श्े्ठ है क्योंकि ्यह सवतंत्ता में अभिवृद्धि करता है । उनहोंने लोकतंत् के संसदी्य सवरूप का समर्थन वक्या, जो कि अन्य देशों के मार्गदर्शकों के साथ संरेखित होता है । उनहोंने ' लोकतंत् को जीवन पद्धति’ के रूप में महत्व वद्या, अर्थात् लोकतंत् का महत्व केवल राजनीतिक क्षेत् में ही नहीं बल्क व्यक्तगत, सामाजिक और आर्थिक क्षेत् में भी है । इसके वल्ये लोकतंत् को समाज की सामाजिक परिस्थितियों में व्यापक बदलाव लाना होगा, अन्यथा राजनीतिक लोकतंत् ्यानी ' एक आदमी, एक वोटि ' की ववचिारधारा गा्यब हो जाएगी । केवल एक लोकतांवत्क समाज में ही लोकतांवत्क सरकार की स्ापना से उतपन्न हो सकती है, इसवल्ये जब तक भारती्य समाज में जाति की बाधाएँ मौजूद रहेंगी, वासतविक लोकतंत् की स्ापना नहीं हो सकती । इसवल्ये उनहोंने लोकतंत् और सामाजिक लोकतंत् सुनिश्चित करने के वल्ये लोकतंत् के आधार के रूप में बंधुतव और समानता की भावना पर ध्यान केंद्रित वक्या ।
सामाजिक आ्याम के साथ-साथ आंबेडकर ने आर्थिक आ्याम पर भी ध्यान केंद्रित वक्या ।
वे उदारवाद और संसदी्य लोकतंत् से प्रभावित थे तथा उनहोंने इसे भी सीमित पा्या । उनके अनुसार, संसदी्य लोकतंत् ने सामाजिक और आर्थिक असमानता को नज़रअंदाज वक्या । ्यह केवल सवतंत्ता पर केंद्रित होती है, जबकि लोकतंत् में सवतंत्ता और समानता दोनों की व्यवस्ा सुनिश्चित करना ज़रुरी है ।
समाज सुधार: बाबा साहेब ने अपना जीवन समाज से छूआछूत व असपृ््यता को समापत करने के वल्ये समर्पित कर वद्या था । उनका मानना था कि असपृ््यता को हटिाए बिना रा्ट् की प्रगति नहीं हो सकती है, जिसका अर्थ है समग्ता में जाति व्यवस्ा का उनमूलन । उनहोंने हिंदू दार्शनिक परंपराओं का अध्य्यन वक्या और उनका महत्वपूर्ण मूल्यांकन वक्या । उनके वल्ये असपृ््यता पूरे हिंदू समाज की गुलामी( Slavery) है जबकि अछूतों को हिंदू जावत्यों द्ारा गुलाम बना्या जाता है, हिंदू जाति स्वयं धार्मिक मूवत्ष्यों की गुलामी में रहते हैं । इसवल्ये अछूतों की मुक्त पूरे हिंदू समाज को मुक्त की ओर ले जाती है ।
सामाजिक सुधार की प्राथमिकता: उनका मानना था कि सामाजिक न्या्य के लक््य को प्रापत करने के बाद ही आर्थिक और राजनीतिक
मुद्ों को हल वक्या जाना चिावह्ये । ्यह ववचिार कि आर्थिक प्रगति सामाजिक न्या्य को जनम देगी, ्यह जातिवाद के रूप में हिंदुओं की मानसिक गुलामी की अभिव्यक्त है । इसवल्ये सामाजिक सुधार के वल्ये जातिवाद को समापत करना आवश्यक है । सामाजिक सुधारों में परिवार सुधार और धार्मिक सुधार को शामिल वक्या ग्या । पारिवारिक सुधारों में बाल विवाह जैसी प्रथाओं को हटिाना शामिल था । ्यह महिलाओं के सश्तीकरण का पुरज़ोर समर्थन करता है । ्यह महिलाओं के वल्ये संपवत् के अधिकारों का समर्थन करता है जिसे उनहोंने हिंदू कोड बिल के माध्यम से हल वक्या था ।
जाति व्यवस्ा ने हिंदू समाज को शस्र बना वद्या जो निम्न जावत्यों की समृद्धि के मार्ग में बाधक है जिसके कारण नैतिक पतन हुआ । इस प्रकार असपृ््यता को समापत करने की लड़ाई मानव अधिकारों और न्या्य के वल्ये लड़ाई बन जाती है । वर्ष 1923 में उनहोंने ' बहिष्कृत हितकारिणी सभा( आउटिकास्टस वेलफे्यर एसोसिएशन)’ की स्ापना की, जो दलितों के बीचि शिक्षा और संस्कृति के प्रचिार-प्रसार के वल्ये समर्पित थी । वर्ष 1930 के कालाराम मंदिर आंदोलन में आंबेडकर ने कालाराम मंदिर के
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