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में गति लाने के लिए प्रशासन की ओर से पंचिवर्षीय ्योजनाओं के माध्यम से वृहत उद्े््य एवं सम्य परक कल्याणकारी ्योजनाएँ लागू की गई । इन पंचिवर्षीय ्योजनाओं में आदिवासी समुदा्यों के कल्याणार्थ समुवचित धनराशि की व्यवस्ा की गई । प्रथम पंचिवर्षीय ्योजना में सप्टि रूप से ्यह सिद्धांत प्रतिपादित वक्या ग्या कि सामान्य विकास कार्यक्रमों को तै्यार करते सम्य पिछड़े वगकों का विशेष ध्यान रखा जाना चिाहिए । साथ ही अनुसूवचित जनजावत्यों के लिए अतिरर्त और गहन विकास हेतु विशेष उपबंधों का प्र्योग वक्या जाना चिाहिए । दूसरी पंचिवर्षीय ्योजना में मुख्यतः अनुसूवचित जनजावत्यों की
सामाजिक और आर्थिक समस्याओं को समझते हुए नीवत्याँ बनाई गई । वासतव में ्यह आ्योजन देश के प्रथम प्रधानमंत्ी पं. जवाहर लाल नेहरू द्ारा प्रतिपादित पंचिशील के सिद्धांतों की दार्शनिक प्रणाली पर आधारित थी । इस ्योजना के अंतर्गत देश में सर्वप्रथम 43 बहुउद्ेशी्य आदिवासी विकास खणड स्ावपत किए गए ।
वद्ती्य पंचिवर्षीय ्योजना के अंत में विशिष्ट बहुउद्ेशी्य आदिवासी विकास खणडों तथा आदिवासी विकास के अन्य कार्यक्रमों का मूल्यांकन रा्ट्रीय संदर्भ में वेरर्यर एल्वन एवं ढेबर आ्योग द्ारा वक्या ग्या । एल्वन समिति ने अपने अध्य्यन में इस बात को सप्टि रूप से सवीकारा कि 10 वरकों में इतने ज्यादा बहुमुखी कार्यक्रम चिलाए गए कि स्वयं अधिकारी भ्रमित हो गए तथा ्यह निश्चित नहीं कर पाए कि कब क्या करे, कौन सा कार्यक्रम पहले चिलाए? साथ ही ्योजनाबद्ध बजटि पद्धति " के कारण एक
्योजना का धन दूसरी ्योजना पर खचि्ष नहीं कर पाए, इस कारण भी धन का अधिक अपव्य्य हुआ । एल्वन कमेटिी के साथ ही ढेबर आ्योग( 1960-1961) ने आदिवावस्यों में व्यापत ऋणग्सतता, निरक्षरता, आदिवावस्यों की सुरक्षा और विकास हेतु विशिष्ट सुझाव दिए तीसरी पंचिवर्षीय ्योजना के प्रारंभ में एल्वन तथा ढेबर आ्योग के सुझाव को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने विशिष्ट बहुमुखी आदिवासी विकास खणड ्योजनाओं को बदलकर आदिवासी विकास खणड नामक ्योजना प्रारंभ की ।
चितुर्थ पंचिवरजी ्योजना के अंतर्गत लघु एवं सीमांत ककृरकों के लिए ककृवर मंत्ाल्य भारत
चतुर्थ पंचवषथी योजना के अंतर्गत लघु एवं सीमांत कृषकों के लिए कृषि मंत्ालय भारत सरकार द्ािा जनजातीय विकास अभिकरण नामक छः परियोजनाएं प्ािंभ की गई, जिनमें दो का लाभ मधय प्देश को मिला जनजातीय अभिकरण सामाजिक सेवा के साथ- साथ आर्थिक विकास को भी गति प्दान करेगा । लेकिन वासतहवकता में यह केवल एक कृषि योजना बनकर रह गई और अधोसंरचनातमक विकास में कोई विशेष सफलता प्ापत नहीं हुई ।
सरकार द्ारा जनजाती्य विकास अभिकरण नामक छः परर्योजनाएं प्रारंभ की गई, जिनमें दो का लाभ मध्य प्रदेश को मिला जनजाती्य अभिकरण सामाजिक सेवा के साथ-साथ आर्थिक विकास को भी गति प्रदान करेगा । लेकिन वासतविकता में ्यह केवल एक ककृवर ्योजना बनकर रह गई और अधोसंरचिनातमक विकास में कोई विशेष सफलता प्रापत नहीं हुई ।
आदिवासी उप्योजना( 1974) चिार पंचिवर्षीय तथा तीन वार्षिक ्योजनाओं, अर्थात 23 वरकों के वन्योजन काल के बाद जनजाती्य समुदा्य की समग् शस्वत का मूल्यांकन करने, पूर्व में वरि्याशनवत आदिवासी विकासातमक कार्यों तथा नीवत्यों की समीक्षा करने, एवं भविष्य की रणनीवत्यों पर प्रकाश डालने के उद्े््य से ्योजना आ्योग भारत सरकार द्ारा श्यामाचिरण दुबे एवं ललिता प्रसाद ववद्या्जी की अध्यक्षता में दो सवमवत्यों का गठन वक्या ग्या । इन दोनों
सवमवत्यों ने अपने अध्य्यन में आदिवासी विकासातमक गतिवववध्यों की विफलता को सवीकार करते हुए इसके मूल कारणों को सप्टि वक्या ।
आदिवासी उप्योजना के अंतर्गत किसी विशेष क्षेत् में रहने वाली आदिजावत्यों के विकास के साथ साथ क्षेत् विकास पर भी विशेष बल वद्या ग्या । चिूंकि सभी आदिवासी समाज की समस्याओं की जड़ में ऋणग्सतता, शोषण एवं अशिक्षा ही है, अतः उप्योजना में इन समस्याओं के निराकरण को प्राथमिकता दी गई ।
उप्योजना काल में आदिवासी विकास: पाँचिवी पंचिवर्षीय ्योजना का प्रारूप तै्यार करते सम्य समपूण्ष आदिवासी विकास के प्रश्नों को मुख्यतः तीन दृष्टिकोणों से देखा ग्या । प्रथम, आदिवासी केंद्रीकरण वाले क्षेत्, वद्ती्य, बिखरी हुई आदिवासी जावत्यां और तृती्य, आदिम जनजाती्य समूह । इस अवधवन्यम का वरि्यान्वयन देश के 9 राज्यों आंध् प्रदेश, झारखणड, गुजरात, राजस्ान, मध्य प्रदेश, छत्ीसगढ़, हिमांचिल प्रदेश, उड़ीसा तथा महारा्ट् में हो चिुका है । इसके अतिरर्त हाल ही में वन अवधवन्यम 2006 वरि्याशनवत वक्या ग्या है, जिसके द्ारा अनुसूवचित जनजावत्यों को परंपरागत वन भूमि पर पुनः अधिकार वद्या ग्या है ।
संक्षेप में ्यह कहा जा सकता है कि रा्ट्रीय संदर्भ में इन ७० वरकों में आदिवासी विकास के लिए जो महतवपूर्ण एवं ऐतिहासिक कदम उठाए गए, उनमें 1956 में आदिवासी विकास प्रवरि्या के पाँचि मार्गदशजी सिद्धांत- पंचिशील को अपनाना, 1958 में बहुउद्ेशी्य जनजाती्य विकास खणड, 1961 में आदिवासी विकास खणड, 1969 में जनजाती्य विकास अभिकरण, 1974 में आदिवासी उप्योजना, 1987 में ट्रायफेड का गठन, 1993 में 73वाँ संविधान संशोधन, 1996 में पंचिा्यत अवधवन्यम 1999 में पृथक आदिवासी का्य्ष मंत्ाल्य का गठन 2001 रा्ट्रीय अनुसूवचित जनजाति आ्योग की स्ापना, 2004 में पृथक अनुसूवचित जनजाति आ्योग की स्ापना तथा वन अवधवन्यम 2006 प्रमुख हैं । �
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