Jan 2026_DA | Seite 37

किए गए हैं ।
• अनुचछेद 335 के द्ारा अनुसूवचित जनजावत्यों के लिए शासकी्य सेवा में 7.5 प्रतिशत स्ान आरक्षित किए गए । इसके साथ-साथ आ्यु सीमा में छूटि, अर्हता मानदंड में छूटि, पदोन्नति में छूटि में तथा अन्य तकनीकि सतरों पर छूटि के प्रावधान किए गए हैं ।
• अनुचछेद 338 में अनुसूवचित जावत्यों एवं
अनुसूवचित जनजावत्यों के कल्याण हेतु रा्ट्पति द्ारा आ्यु्त की वन्युक्त का प्रावधान है । जिसका दाव्यतव संविधान द्ारा अनुसूवचित जावत्यों एवं जनजावत्यों को प्रदत् सुरक्षाओं का मूल्यांकन करना, जनजाती्य लोगों और राज्य सरकारों से संपर्क बनाए रखना, उनके कार्यक्रमों की जांचि करना तथा ्योजनाओं के लिए मार्गदर्शन देना आदि है । ्यह आ्यु्त प्रतिवर्ष रा्ट्पति को अपना
प्रतिवेदन भी भेजता है जिसमें अनुसूवचित क्षेत्ों के प्रशासन तथा अनुसूवचित जनजावत्यों के कल्याण के संबंध में उपलब्धियों एवं कवम्यों को वर्णित वक्या जाता है ।
• अनुचछेद 339 संघ सरकार को अधिसूवचित क्षेत्ों में निवास करने वाले आदिवावस्यों के प्रशासन का अधिकार प्रदान करता है ।
• अनुचछेद 340 जनजावत्यों को सरकारी शिक्षण संस्ानों में नामांकन तथा अध्य्यन के लिए आरक्षण का उपबंध करता है ।
• अनुचछेद 342 के माध्यम से रा्ट्पति जनजावत्यों को अनुसूवचित जनजाति का दर्जा प्रदान करता है ।
पृथक प्रशासनिक व्यवस्ा: जनजाती्य समुदा्य शेष समाज से कटिा हुआ तथा सवद्यों से पिछड़ा है । साथ ही इस समुदा्य की अपनी पृथक संस्कृति, परंपरा एवं भिन्न पहचिान रही है । इसी कारण भारती्य संविधान में जनजावत्यों के लिए शेष समाज से भिन्न प्रशासनिक व्यवस्ा का प्रावधान संविधान की पाँचिवी एवं छठी अनुसूचिी में वक्या ग्या है ।
अनुसूवचित क्षेत्: संविधान के अनुचछेद 244 तथा 244( 1) में अनुसूवचित क्षेत्ों तथा जनजाती्य क्षेत्ों के प्रशासन का प्रावधान है । संविधान की पाँचिवी अनुसूचिी के अनुसार भारत का रा्ट्पति किसी भी राज्य का कोई क्षेत्“ अनुसूवचित क्षेत् घोषित कर सकता है । 1977 से अब तक दो रा्ट्पवत्यों ने अनुसूवचित क्षेत् घोषित किए हैं । ्ये क्षेत् निम्न नौ राज्यों में हैं- आंध् प्रदेश, झारखंड, गुजरात, हिमांचिल प्रदेश, मध्य प्रदेश, महारा्ट्, उड़ीसा, राजस्ान और छत्ीसगढ़ । इन अनुसूवचित क्षेत्ों के गठन के पीछे मुख्यतः दो उद्े््य रहे हैं पहला लघु प्रवरि्या तथा बिना बाधा के आदिवावस्यों की सहा्यता करना तथा दूसरा, अनुसूवचित क्षेत्ों को विकास के पथ पर लाना एवं जनजावत्यों के हितों की रक्षा करना ।
गौरतलब है कि घोषित अनुसूवचित क्षेत्ों वाले राज्य के राज्यपाल को विशेष और व्यापक अधिकार प्रापत होते हैं । राज्यपाल ही ्यह त्य करता है कि संसद ्या विधान मणडलों द्ारा पारित कानून इन क्षेत्ों में लागू होंगे ्या नहीं । राज्यपाल
इन क्षेत्ों में शांति बनाए रखने एवं प्रशासन के भली-भाँति संचिालन के लिए वन्यम भी बना सकते हैं । भूमि हसतांतरण को रोकना, भूमि आवंटिन को वन्यंवत्त करना, साहूकारों के गतिवववध्यों को रोकना आदि ऐसे ववर्य हैं, जिनपर राज्यपाल का्य्षवाही कर सकते हैं । पांचिवी अनुसूचिी के खणड 4 में अनुसूवचित क्षेत् वाले प्रत्येक राज्य में आदिवासी सलाहकार समिति के गठन का प्रावधान है । रा्ट्पति के वनदमेश पर अन्य राज्यों में भी, जहाँ अनुसूवचित क्षेत् नहीं हैं, आदिवासी सलाहकार समिति के गठन का प्रावधान है । तमिलनाडु तथा पश्चिम बंगाल ऐसे ही दो राज्य हैं, जहाँ अनुसूवचित क्षेत् नहीं होने के बावजूद वहाँ आदिवासी सलाहकार सवमवत्याँ गठित हैं । आदिवासी सलाहकार समिति में अधिक से अधिक 20 सदस्य हो सकते हैं । इस समिति का ्यह दाव्यतव है कि वह आदिवासी कल्याण तथा प्रगति के संबंध में राज्यपाल को सलाह दे । पाँचिवी अनुसूवचि के खणड तीन में ्यह प्रावधान है कि राज्यपाल आदिवासी सलाहकार समिति की गतिवववध्यों से संबंधित प्रतिवेदन रा्ट्पति के पास भेजता है ।
आदिवासी क्षेत्: आदिवासी क्षेत् एक अर्थ में तो अनुसूवचित क्षेत् है, किंतु संवैधानिक भाषा में आदिवासी क्षेत् वे हैं जो संविधान की छठीं अनुसूचिी में घोषित किए गए हैं । ्ये क्षेत् हैं- असम, मेघाल्य, मिजोरम तथा वत्पुरा । इन राज्यों में आदिवासी क्षेत्ों के प्रशासन हेतु सवा्यत् जिला एवं क्षेत्रीय परिषदों का गठन वक्या जाता है । प्रत्येक सवा्यत् जिले के प्रशासन के लिए एक- एक जिला परिषद की स्ापना की जाती है । जिला परिषद के सदस्यों की संख्या अधिक से अधिक 30 होती है, जिनमें से चिार को राज्यपाल मनोनीत करता है । शेष सदस्यों का चि्यन व्यसक मताधिकार के आधार पर वक्या जाता है । राज्यपाल चिाहे तो वह सभी चिुनाव क्षेत्ों को आदिवावस्यों के लिए आरक्षित कर गैर-आदिवासी लोगों को चिुनावी प्रतिनिधि पद से वंवचित कर सकता है ।
विकासातमक गतिवववध्याँ: सवतंत्ता प्राशपत के पश्चात देश में आर्थिक एवं सामाजिक विकास
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