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्यही नहीं इस देश में आज की तारीख में ्यवद सबसे सबसे बड़ी सजा का हकदार कोई अपराधी हैं तो वे सभी हैं, जो दलितों, आदिवावस्यों और शसत््यों के साथ खुलेआम भेदभाव, अन्या्य, शोषण, उतपीड़न कर रहे हैं और जिनहें धर्म और संसद्भति के नाम पर जो लोग और संगठन लगातार सह्योग प्रदान करते रहते हैं ।
लेकिन इसके लिए दलित सत्ीतववादी लेखकों का‘ साहित्य-सृजन’,‘ मनुसमृवत’ केशनद्रत न होकर‘ शूद्र व द्रवीण साहित्य’ केशनद्रत होना चिाहिए । जाति सहित लिग-असमानता भी एक‘ फकूडल’( सामंतवादी) संरचिना है । पारिवारिक मूल्यों को चिुनौती देकर एवं लिंगसमबनधी प्राककृवतक देन एवं स्ावपत बुवन्यादी मान्यताओं के खिलाफ प्रवतवरि्यातमक विष-वमन कर रिांवतकारी नहीं हुआ जा सकता है । समाज में ऐसी अनेक समस्याएँ हैं जिनके उनमूलन के लिए सार्थक एवं न्या्य संगत लड़ाई लड़ने की आवश्यकता है पर ्ये सारी लड़ाइ्याँ समाज की सार्थक परमपराओं के विरुद्ध नहीं बल्क निरर्थक
परमपराओं के विरुद्ध होनी चिाहिए । नारीवाद राजनैतिक आंदोलनका एक सामाजिक सिद्धांत है जो शसत््यों के अनुभवों से जनित है । हालाकि मूल रूप से ्यह सामाजिक संबंधो से अनुप्रेरित है लेकिन कई सत्ीवादी विद्ान लैंगिक असमानता और औरतों के अधिकार इत्यादि पर ज्यादा बल देते हैं ।
नारीवादी सिद्धांतो का उद्े््य लैंगिक असमानता की प्रककृवत एवं कारणों को समझना तथा इसके फलसवरूप पैदा होने वाले लैंगिकभेदभाव की राजनीति और शक्त संतुलन के सिद्धांतो पर इसके असर की व्याख्या करना है । सत्ी विमर्श संबंधी राजनैतिक प्रचिारों काजोर प्रजनन संबंधी अधिकार, घरेलू हिंसा, मातृतव अवकाश, समान वेतन संबंधी अधिकार, ्यौन उतपीड़न, भेदभाव एवं ्यौन हिंसा पररहता है ।
सत्ीवादी विमर्श संबंधी आदर्श का मूल क्थ्य ्यही रहता है कि कानूनी अधिकारों का आधार लिंग न बने । पश्चिम में नारीवादी आंदोलनकी एक लंबी पंरपरा रही है, सैकड़ों
वर्ष की । मताधिकार आंदोलन 19वीं सदी से चिला आ रहा है । आज वहां इतना जो कुछ भी हासिलवक्या ग्या है, लड़ कर वक्या है, समाज लड़ाई से बदलता है, आंदोलन से बदलता है, सिर्फ कानून बनाने से नहीं बदलता है समाज । इसलिए पश्चिम में सत्ी के अधिकार की चिेतना वब्कुल नीचिे तक गई है ।“ ्यवद आर्थिक आतमवनभ्षरता ही सवाधीनता की कुंजी है तो जब तक सत्ी के पास देह है और संसार के पास पुरुष, तब तक सत्ी को वचिंता की क्या जरूरत? जरूरत है तो देह को पुरुष के सवावमतव से मु्त करके अपने अधिकार में लेने की, क्योंकि ्यौन शुवचिता, पतिव्रत, सतीतव जैसे मूल्य सत्ी के सममान का नहीं पुरुष के अहंकार की दीनता और असुरक्षा का पैमाना है, पितृ सत्ा के मूल्य हैं और सत्ी की बेड़ियाँ हैं । जिसने ्ये बेड़ियाँ उतार दी हैं वह सत्ी विशिष्ट है” । लेखकगण नारी मुक्त का समबनध सत्ी-देह की सवतंत्ता से लगा रहे हैं । वे‘ आदमी की निगाह में औरत ' नामक अपनी
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