सतर पर खड़ा कियरा जरा सके । आंबेडकर ्रा मत थरा कि राष्ट्र वयसकतयों से होतरा है, वयसकत के सुख और समृतधि से राष्ट्र सुखी और समृधि बनतरा है । िरा. आंबेडकर के विचरार से राष्ट्र एक भराव है, एक चेतनरा है, जिस्रा सबसे छो्टरा घ्ट् वयसकत है और वयसकत को सुसंस्कृत तथरा राष्ट्रीय जीवन से जुड़ा होनरा चरातिए । राष्ट्र को सववोपरि मरानते हुए आंबेडकर वयसकत को प्रति ्रा केद् बनरानरा चरािते थे । वह वयसकत को सराधय और रराजय को सराधन मरानते थे । िरा. आंबेडकर ने इस देश की सरामरातज्-सरांस्कृतिक वसतुरत ससथति ्रा सही और सराफ आंकलन कियरा है । उनिोंने ्िरा कि भरारत में किसी भी आर्थिक- रराजनीतिक क्ररांति से पहले एक सरामरातज्- सरांस्कृतिक क्ररांति की दर्रार है ।
पंडित दीनदयराल उपराध्याय ने भी अपनी विचरारधराररा में‘ अंतयो्य’ की बरात कही है । अंतयो्य यरातन समराज की अंतिम सीढ़ी पर जो बै्ठरा हुआ है, सबसे पहले उस्रा उदय होनरा चरातिए । राष्ट्र को सशकत और स्वावलंबी बनराने के लिए समराज की अंतिम सीढ़ी पर जो लोग है उन्रा सोशियो इकोनॉमिक डेवलपमें्ट करनरा होररा । किसी भी राष्ट्र ्रा तव्रास तभी अर्थपदूण्म हो सकतरा है जब भौतिक प्रति के सराथ सराथ आधयरासतम् मूल्यों ्रा भी संगम हो । जिरां तक भरारत की विशेषतरा, भरारत ्रा कलचर, भरारत की संस्कृति ्रा सवराल है तो यह विशव की बेहतर संस्कृति है । भरारतीय संस्कृति को समृवि और श्रेष्ठ बनराने में सबसे बड़ा योर्रान दलित समराज के लोगों ्रा है । इस देश में आदि कवि
कहलराने ्रा सम्मान केवल महर्षि वरास्म्ी को है, शास्त्रों के ज्ञातरा ्रा सम्मान वेदव्यास को है । भरारतीय संविधरान के तनमरा्मण ्रा श्रेय आंबेडकर को जरातरा है ।
वर्तमरान में कुछ देशी-विदेशी शसकतयरां हमरारी इन सरामरातज्-संस्कृतिक धरोहरों को हिंदृतव से अलग करने की योजनराएं बनरा रही है । मार्क्स की पदूंजीवरा्ी वयवस्था में जिरां मुठ्ी भर धनपति शोषक की भदूतम्रा में उभरतरा है वहीं जराति और नसलभेद वयवस्था में एक पदूररा ्रा पदूररा समराज शोषक तो ्दूसररा शोषित के रुप में नजर आतरा है । जिस्रा समराधरान आंबेडकर सशकत हिं्दू समराज में बतराते है कयोंकि वह जरानते थे कि हिं्दू धर्म न तो इसे मरानने वरालों के लिए अफीम है और न ही यह किसी को अपनी ज्िन में लेतरा है । वसतुतः यह मरानव को पदूण्म सवतंत्रतरा देने वरालरा है । यह चिरस्थायी रुप से तव्रास, संपन्तरा तथरा वयसकत व समराज को संपदूण्मतरा प्रदान करने ्रा एक सराधन है । िरा. आंबेडकर के परास भरारतीय समराज ्रा आंखों देखरा अनुभव थरा, तीन हजरार विगों की पीड़ा भी थी । इसलिए आंबेडकर सही अथगों में भरारतीय समराज की उन गहरी वसतुतनष्ठ सच्चराइयों को समझ पराते हैं, जिनिें कोई मार्क्सवरा्ी नहीं समझ सकतरा ।
िरा. आंबेडकर ्रा सपनरा थरा कि एक जरातिविहीन, वर्गविहीन, सरामरातज्, आर्थिक, रराजनीतिक, लैंगिक और सरांस्कृतिक विषमतराओं से मुकत समराज । ऐसरा समराज बनराने के लिए हिं्दू समराज ्रा सशकती्रण सबसे पहली प्राथमिकतरा होगी । यही आंबेडकर की सोच और संघर्ष ्रा सरार है । आज आंबेडकर इस देश की संघर्षशील और परिवर्तन्रारी समदूिों के हर महतवपदूण्म सवराल पर प्रासंगिक हो रहे हैं, इसी ्रारण वह तव्रास के लिए संघर्ष के प्ेरणरा स्ोत भी बन गए है । मेररा मराननरा है कि हिंदुतव के सिरारे ही समराज में एक जन-जराररण शुरू कियरा जरा सकतरा है । जिसमें हिं्दू अपने संकीर्ण मतभेदों से ऊपर उ्ठ्र सवयं को विरराट्-अखंड हिंदुस्तानी समराज के रूप में संरत्ठत कर भरारत को एक मिरान राष्ट्र बनरा सकते हैं । �
iQjojh 2026 15