eMag_March 2021_Dalit Andolan | Page 46

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डॉ आुंबेडकर और जाति प्रथा -3

( गतांक से आगे ) डॉ भरीमराव आंबेडकर

स तरह वरश्त-पूजा का सिद्धांत भारत

में जातिप्रथा के प्रचिलन के निराकरण में
बहुत लाभदायक साबित नहीं होता । पश्चिमी विद्ानों ने संभवतः वरश्त पूजा को विशेष महत्ि नहीं दिया , लेकिन उनहोंने दूसरी वराखराओं को आधार बना लिया । उनके अनुसार भारत में जिन मानरताओं ने जातिप्रथा को जनम दिया है , वे हैं- वरिसाय , विमभन् कबायली संगठनों का प्रचिलन , नयी धारणाओं का जनम और संकर जातियां । प्रश्न यह उठता है कि ्रा वे मानरताएं अनर समाजों में मौजूद नहीं हैं और ्रा भारत में ही उनका विशिष्ट रूप विद्मान है । यदि वे भारत की विशेषताएं नहीं हैं और पूरे वि्ि में एक समान हैं , तो उनहोंने भूमंडल के किसी अनर भाग में जातियां ्रों नहीं गढ़ लीं ? ्रा इसका कारण यह है कि वे देश वेदों की भूमि की अपेक्ा अधिक पवित् हैं या विद्ान गलती पर हैं ? मैं सोचिता हूं कि बाद की बात सही है ।
अनेक लेखकों ने किसी न किसी मानरता के आधार पर अपनी-अपनी विचिारधारा के समर्थन में उच्च सैद्धांतिक मूलरों के दावे किए हैं । कोई विवशता प्रकटि करते हुए कहता है कि गहराई से देखने पर प्रकटि होता है कि ये सिद्धांत उदाहरणों के सिवाय कुछ भी नहीं हैं । मैथरू आनवोलड का कहना है कि इसमें '' महानता का कुछ सार न होते हुए भी महान नाम जुड़े हुए हैं ।'' सर डेनजिल इबबतसन , नेसफीलड , सेनार और सर एचि . रिजले के सिद्धांत यही हैं । मोटिे तौर पर इनकी आलोचिना में यह कहा जा सकता है कि यह लीक पीटिने का प्रयत्न है । नेसफीलड उदाहरण प्रसतुत करते हैं , '' सिर्फ कार्य , केवल कार्य ही वह आधार था , जिस पर भारत की
जातियों की पूर्ण प्रथा का निर्माण हुआ ।'' लेकिन उनहें यह बताना होगा कि वह इस कथन से हमारी जानकारी में कोई इजाफा नहीं करते , जिसका सार यही है कि भारत में जातियों का आधार वरिसाय मात् है और यह सिरं में एक लचिर दलील है । हमें नेसफीलड महोदय से इस सवाल का जवाब चिाहिए कि यह कैसे हुआ कि विमभन् वरिसायी वर्ग विमभन् जातियां बन गए ? मैं अनर नृजाति-विज्ञानियों के सिद्धांतों पर विचिार करने के लिए सहर्ष प्रसन् होता , यदि
यह सही न होता कि नेसफीलड का सिद्धांत एक अजीब सिद्धांत है ।
मैं इन सिद्धांतों की आलोचिना जारी रखते हुए इस विषय पर अपनी बात रखना चिाहूंगा कि जिन सिद्धांतों ने जातिप्रथा को विभाजनकारी नियमों के पालन की एक सिाभाविक प्रवृमत् बताया है , जैसा कि हब्यटि्ड सपेंसर ने अपने विकास के सिद्धांत में वराखरा की है और इसे सिाभाविक बताया है तथा इसे ' जैविक संरचिना भेद ' कहकर लचिर पुरातनपंथी शबद जाल की धारणाओं को
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