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21वीं सदी का दूसरा दशक : मोदी सरकार में मिला दलितों को न्ाय
भर रहे हैं 65 साल पुराने गड्े
एक हजार साल तक पहले मुबसलम
शासकों और फिर अंग्रेजों की गुलामी
के बाद जब 1947 में देश सितनत् हुआ , उस वकत देश में मौजदूद दलित वर्ग कको ऐसा लगा था कि सितनत् भारत में बनने जा रही कांग्रेस के नेतृति वाली सरकार उनकी भी सुधि लेगी । देश की इस बहुसंखयक आबादी की आंखों में जको सपने थे , उन सपनों में उनहें अपना और परिवार का विकास तको नजर आ ही रहा था , साथ ही उममीद थी कि अब देश की अपनी सरकार , उनहें गरीबी और बेहाल जीवनसतर से मुबकत दिलाने के लिए युद्धसतर पर कदम उठाएगी । लेकिन अफ़सकोस की बात यह रही कि देश के दलित , गरीब और किसान आबादी कको आजादी के 60 बाद तक सिर्फ सपने दिखाए गए । दशकों तक सत्ा संभालने वाले कांग्रेस नेताओं ने विकास के हसीन सपनों की आड़ में सिर्फ िकोट बैंक की राजनीति की । रकोटी , कपडा , मकान से लेकर बिजली , पानी और सड़क सरीखी जीवन की मदूल जरूरतों के लिए तरसने वाली जनता के कलयाण की बातें संसद से लेकर नुककड़ तक हकोने वाले राजनेताओं के भाषणों में सुनी जाती रही , लेकिन वासतविकता के धरातल पर ककोई ठकोस उपाय नहीं किये गए और न ही विकास समबनधी ऐसे कदम उठाये गए , जको पदूरे देश की आबादी और
देश का संतुलित विकास करने की दिशा में यकोगदान करते । एक तरफ जहां सिर्फ नगरीय विकास कको प्राथमिकता दी गयी , वही ग्रामीण इलाकों में रहने वाली जनता कको विकास के नाम पर सिर्फ उतना ही मुहैया कराया गया , जितने से उनकी सांसे चलती रहे और चुनाव के समय वह िकोट के रूप में सिर्फ सत्ा प्राप्त के माधयम बनी रहे ।
2014 में जब केंद्र की सत्ा कांग्रेस के हाथ से निकल कर भाजपा नीत एनडीए गठबंधन के हाथ में आई तको प्रधानमंत्ी नरेंद्र मकोदी पर सभी की निगाह टिक गयी । भाजपा नेता नरेंद्र मकोदी जिस तरह से पाटटी कको पदूण्स बहुमत दिलाने के बाद केंद्र की सत्ा तक पहुंचे तको देश की दलित औऱ गरीब जनता कको अहसास हुआ कि
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