eMag_Jan 2021_Dalit Andolan | Page 50

egkuk ; d

विधवा बनाए रखने से बेहतर है । जला देने से तीनों आशंकाएं , जिनका विधवा कको सामना करना पड़ता है , नषट हको जाती हैं । मरने से वह ककोई समसया नहीं रहेंगी और वह न जाति बाहर और नही जाति में पुनर्विवाह करेगी , परंतु उसे विधवा रूप में जीवित रहने देना , जलाने से अचछा और वयािहारिक भी है । जहां यह अपेक्ाककृत मानवीय प्रथा है , इससे पुनर्विवााह की आशंका भी टलती है , परंतु इससे उस वर्ग की नैतिकता सरावपत नहीं रह सकती । इसमें ककोई संदेह नहीं कि अनिवार्य वैधवय में सत्ी बच जाती है , परंतु पदूरे जीवन उसे किसी की वैध पत्नी बनने के अधिकार से वंचित कर दिया जाता है । इससे अनैतिकता के लिए रासते खुलते हैं , लेकिन यह ककोई दुःसाधय कार्य नहीं है । उसे इस हालत में लाया जा सकता है कि उसमें आकर्षण लेशमात् भी न बचे ।
जाति-संरचना करने वाले समुदाय में बचे
पुरुषों ( विधुरों ) की समसया अधिक महत्िपदूण्स है । यह विधवाओं की अपेक्ा अधिक विकराल है । इतिहास के आरंभ से ही पुरुष का सत्ी की अपेक्ा अधिक महत्ि रहा है । इसका प्रभुति हर समाज में रहा है । इसकी प्रतिषठा अधिक रही है । पुरुष की परंपरागत श्रेषठता के कारण उसकी इचछाओं का सदा सममान किया जाता रहा है । ददूसरी आरे नारी सदा धार्मिक , आर्थिक और सामाजिक असमानताओं का शिकार हकोती रही है । इस हालत में विधवाओं के साथ वैसा ही बर्ताव नहीं किया गया है , जैसा बचे हुए पुरुषों ( विधुर ) के साथ किया गया है । उसे उनकी मृत पत्नी के साथ जला डालना दको कारणों से खतरनाक है । पहली बात तको यह है कि ऐसा किया नहीं जा सकता , कयोंकि वह पुरुष है । ददूसरे यदि ऐसा किया जाए तको एक तगड़ा वयबकत जाति की खातिर लु्त हको जाएगा । अब उसने आसानी से निबटने के लिए दको विकलप रह जाते हैं । मैं इनहें आसान विकलप इसलिए कह सकता हदूं , कयोंकि वह समाज के लिए उपयकोगी हैं ।
( जारी ...)
50 Qd » f ° f AfaQû » f ³ f ´ fdÂfIYf tuojh 2021