eMag_Feb 2021_Dalit Andolan | Page 37

भावना इनकी संसकृति में नहीं पायी जाती है । यह प्रकृति के सहचर और पुजारी हैं । इनके धार्मिक-सथि कोई मंदिर-मससिद या तवतश्ट सथान न होकर खुला आकाश होता है । वह कहीं भी अपनी उपासना-आराधना पूजा पाठ कर सकते हैं । आदिवासी संसकृति एवं प्रकृति में गहरा आतमीय संबंध है । तभी तो प्रकृति प्रदत्त उतसव को आदिवासियों ने अपने जीवन से जोड़ लिया है । जबकि सभय कहे जाने वाले विकसित संसकृति से प्रकृति का संबंध संघर्ष का रहा है । रिितः वह प्रकृति का दोहन चाहते हैं । अब रक्षण का विचार महज भौतिक उपयोगितावादी सार है । वर्तमान युग में इनका संबंध केवल भारी वैज्ातनक विकास , औद्ोतगक और वाणिजय का है ।
बिरसा मुंडा और कोमरम भीम पर आधारित साहितय में आदिवासी समाज , संसकृति एवं संघर्ष का तचत्ण हुआ है । भारत में समग् रूप से 450 से अधिक जनजाति निवास करती हैं , जिनमें मुंडा और गोंड प्रमुख हैं । बिरसा मुंडा के ‘ मुंडा ’ समुदाय और कोमरम भीम के ‘ गोंड ’ समुदाय दोनों की संसकृति में समानता है । इन दोनों का साहितय मुंडा समुदाय और गोंड समुदाय पर आधारित है । भारत में मुंडा और गोंड जाति में भी अनेक उपजाति हैं और उनकी सामाजिक , सांसकृतिक , धार्मिक आसथाएं तथा संसकृति में कुछ समानता होते हुए भी भिन्नता हैं । इन आदिवासियों की संसकृतियों को न्ट करने का प्रयास कई सालों से होता आ रहा है । फिर भी यह संसकृति जीवित है । अनेक परिससथतियों की चुनौतियों का सामना करते हुए मुंडा और गोंड समाज की संसकृति जीवित है । उनके गीत , तयौहार उनकी चेतना को बनाते हैं ।
भूगोलवेत्ताओं के अनुसार छोटा नागपुर भारत की सबसे प्राचीन भूमि है । मुंडा इस प्रदेश में रहने वाले हैं इसलिए मानवशासत्ी इनहें अधिक प्राचीन आदिवासी बताते हैं । पुराणों तथा समृतियों में दोनों जातियों का उ्िेख मिलता है । और इनका रहन-सहन कई हजार वर्ष पुराना है । भारत में अंग्ेिों के आगमन से पहले आदिवासी हिंदुओं में गिने जाते थे तथा
यह अपने प्रदेशों में शासन करते थे । दोनों समाज आज भी असभय ससथति में जी रहे हैं । िजिा निवारण हेतु कमर में एक कपड़ा लपेट लेते हैं । भारत में भारतीय जनजातियों में मुंडा की संखया अधिक है वह मुखय रूप से झारखंड , छत्तीसगढ़ , बिहार , उड़ीसा , मधय प्रदेश , पसशचम बंगाल आदि क्षेत्ों में निवास करते हैं ।
भारत में गोंड़ों की आबादी सर्वाधिक है । लेकिन आदिलाबाद ( तेलंगाना राजय ) जिले में इनकी आबादी उस अनुपात में नहीं है । तेलंगाना ( हिंदी-तेलुगु ) राजय के आदिलाबाद जिले में गोंड रहते हैं , जो खेती पर निर्भर हैं । दोनों जनजातीय साहितय में सांसकृतिक उभार के साथ-साथ संसकृति पर आने वाले संकट को भी दर्शाया गया है । आदिलाबाद में निवास करने वाले गोंड जाति के लोग आजकल तीर , धनुष , कु्हाड़ी , भाला आदि सभी उपकरण का प्रयोग अपने जीवन विकास में कर रहे हैं । गोंड जाति के लोग अपने शरीर को आभूषणों से सजाते हैं । गोदना एक उनकी सामाजिक विशेषता है । बिरसा मुंडा और कोमरम भीम
पर आधारित साहितय में हम देख सकते हैं कि मुंडा जाति और गोंड जाति में धार्मिक आसथाओं , पूजा-पाठ में विभिन्नता दिखाई देती है । मुंडा और गोंड जनजाति पशु-बलि पर भरोसा करती हैं । वह मानते हैं कि ईशवर , भगवान को बलि देने पर वह हमारे समाज को सुखी रखेगा । ऐसे विशवास और अवधारणा ही धार्मिक कर्मकांडों अथवा प्रगतिशील नैतिक ततवों को जीवंत रखते हैं । दोनों आदिवासी समाजों में वयापि जादू-टोना एवं भूत-प्रेतों पर विशवासों पर विशेष दृष्ट जाती है । कयोंकि उनकी मानयिा के अनुसार भूत-प्रेत आस-पास ही निवास करती है यह दोनों समाज जादू टोना में अधिक विशवास करते हैं ।
आदिवासियों की दृष्ट ‘ जियो और जीने दो ’ में विशवास करती है । ये अपने नैतिक मू्यों को सुरक्षित रखने हेतु प्राणों को दाँव पर लगा देते हैं । लेकिन अपनी पारंपरिक नैतिकता का उ्िंघन करना उनके वश के बाहर होता है । वे अपनी बात के पकके होते हैं । आधुनिकता के साये में एक वचन के नैतिक मानदंड टूटते
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