eMag_Feb 2021_Dalit Andolan | Page 15

क्या है हलराल ?
तुष्टिकरण के लिए करांग्रेस ने थोपी हलराल व्यवस्था
सिर्फ मरांस तक सीमित नहीं है हलराल
होटलों के लिए हलाल या झटका मांस की जानकारी सार्वजनिक रूप से ग्ाहकों को देना अनिवार्य कर दिया है । यहां पर प्रश्न उठना सवाभाविक है कि हलाल कया है ? हलाल मांस का विरोध कयों किया जा रहा है ? और हलाल हिनदू धर्म विरुद्ध कैसे है ?

क्या है हलराल ?

सामानय रूप से हलाल या ह्िाि अरबी भाषा का शबद है , जिसका अर्थ वैध या अनुमति प्रापि होता है । मुससिम धर्म-कानून , परमपराओं और वयवहार में हलाल को मुससिम जीवन के हर पक्ष में शामिल किया गया है । मुससिम धर्म के प्रतयेक वयसकि ( वह चाहे किसी भी देश में रहता हो ) के लिए हलाल की मानयिाओं का अनुपालन अनिवार्य रूप से करना पड़ता है । हलाल मानयिा के अनुसार मांस के लिए पशुओं का वध करते समय कुछ अनिवार्य मुससिम धार्मिक परमपराओं का पालन करना होता है
और इस कार्य में केवल मुससिम श्तमकों का इसिेमाल किया जाता है । मुससिम धर्म में हलाल को इस तरह से जोड़ दिया गया है कि कोई भी मुससिम सिर्फ हलाल प्रकिया के तहत वध किये गए जानवर के मांस का ही सेवन करेगा ।
हलाल मांस का विरोध हिनदू , सिकख सहित गैर मुससिमों द्ारा दशकों से किया जा रहा है । कारण यह है कि हलाल परमपरा में पशु को तब तक जिनदा रखा जाता है , जब तक उसके शरीर से खून पूरी तरह निकल नहीं जाता है । इसके विपरीत हिनदू , सिकख सहित अनय समाज में पशु वध के लिए जिस प्रकिया को अपनाया जाता है , उसमें पशु की तुरंत मौत हो जाती है । इसे झटका प्रक्रिया कहा जाता है । हिनदू धार्मिक परमपराओं में बलि देने की जिस पारमपरिक पद्धति का वर्णन किया जाता है , उसे झटका प्रक्रिया कहा जाता है । इस पदधयति में पशु जानवर को मारते समय दर्द नयूनतम होता है । हलाल और हराम को लेकर जारी विवाद सिर्फ पशु वध के तरीके तक सीमित नहीं है । हलाल के नाम पर सुनियोजित तरीके से मांस उद्ोग को सिर्फ मुससिम वर्ग तक सीमित कर दिया गया , जहां गैर मुससिम की कोई भूमिका नहीं है । ऐसे में हिनदू , सिकख सहित गैर मुससिम अनय समाज के मांसाहारी लोग हलाल मांस का लगातार विरोध करते आ रहे हैं ।

तुष्टिकरण के लिए करांग्रेस ने थोपी हलराल व्यवस्था

भारत में सैकड़ों वरषों से मांस को बलि या झटका विधि से ही प्रापि किया जाता था । लेकिन मुससिम आक्रांताओं के आगमन , भारत की भूमि पर कब्ज़ा करना और फिर हिनदू धर्म- संसकृति पर प्रहार के साथ ही भारतीय समाज में भिन्न-भिन्न तरह की मानयिाएं , समसयाएं , परंपराएं , प्रथाएं या कुप्रथाएं हावी होती चली गयी । मुससिम आक्रांताओं के कारण भारत की मूल संसकृति , भाषा , विचार , राजनीति , धर्म , नीति अर्थात सभी प्रभावित हुए । सविनत् के बाद दशकों तक सत्ता संभालने वाली कांग्ेस और उसके सहयोगी राजनीतिक दलों ने
धर्मनिरपेक्षता की आड़ में सिर्फ मुससिम तुष्टकरण करते हुए आक्रांता मुससिमों की मानयिाओं को बढ़ावा देते हुए पूरे देश में हलाल अवधारणा को थोप दिया गया । हलाल और हराम के आधार पर खाद् पदाथषों से लेकर मानवीय जीवन में सार्वजनिक रूप से किये जाने वाले भेद ने देश में जिस नयी परंपरा को जनम दिया , उसके नकारातमक प्रभाव देखे जा सकते हैं ।
हलाल के नाम पर सिर्फ मांस के वयवसाय में मुससिम वर्ग के आधिपतय है । मांस का वयवसाय करने वाली हिनदू जातियां विशेष रूप से खटिक वर्ग के सामने न केवल रोजगार के संकट पैदा किये हैं , वही इससे धमािंिरण को भी बढ़ावा मिला है । हलाल वयवसथा की आड़ में खटिक वर्ग को मांस के वयवसाय से दूर कर दिया गया । इसे दलितों के साथ सुनियोजित रूप से की जाने वाली आर्थिक असपृशयिा के रूप में देखा जा सकता है । झटका मांस बेचने वाले या तो रोजगार विहीन हो चुके हैं या फिर समझौता करते हुए हलाल मांस को बेचने के लिए विवश हैं । सरकारी से लेकर गैर सरकारी सिर पर हलाल मांस को दिए गए प्रोतसाहन के कारण मांस वयवसाय पर मुससिम वर्ग पूरी तरह हावी है । तुष्टकरण के लिए कृषि एवं प्रसंसकृि खाद् उतपाद निर्यात विकास प्राधिकरण रेड मीट मैनयुअल में ‘ हलाल ’ शबद को जोड़ दिया गया था । इसके विरोध करते हुए गैर मुससिम समाज कि जनता मैनयुअल से ‘ हलाल ’ शबद को हटाने की मांग वरषों से कर रहे थे । हिनदू , सिकख सहित अनय गैर मुससिम समाज की जनता द्ारा लमबे समय से लंबित मांग पर अंिितः मोदी सरकार ने निर्णय ले लिया और गत माह केंद्र सरकार ने मैनयुअल से ‘ हलाल ’ शबद को हटा दिया ।

सिर्फ मरांस तक सीमित नहीं है हलराल

मुससिम धर्म हलाल और हराम के आधार पर हर वसिु एवं मानव के साथ भेद करता है । मुससिम धर्म में हलाल को जहां सवीकार्यता से
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