eMag_Dec 2020_Dalit Andolan | Page 7

वयश्ि का दृढनिर्णय ही उसका निर्माण करता है , उसकी जाति , पारिवारिक निर्धनता , असुविधाएं और समाज का विरोध उसकी प्रगति को रोक नहीं सकता । डॉ आंबेडकर का कहना था कि समाज का नेतृतव करना आसान नहीं है । समाज का नेतृतव करने के लिए वयश्ि को गुनी और परिश्रमी होना चिाहिए । सफल नेतृतव के लिए डॉ आंबेडकर ने कहा था कि जिसमें धैर्य नहीं , वह नेतृतव नहीं कर सकता । अगर कोई राजनीतिक क्ेत्र में कार्य करना चिाहता है तो उसे राजनीति का गहन अधययन करना होगा । लोगों को लगता है कि नेता बनना सरल है , पर मेरे हवचिार से नेता बनना आसान नहीं है । दलित समाज के युवकों के लिए डॉ आंबेडकर ने आह्ािन किया था कि अपने ऊपर हव्वास करो , अपने प्रयत्ों पर हव्वास करो और अपनी बुद्धि एवं क्मता से कठिनाइयों को पार करो । ज्ान सबसे पवित्र वसिु है । इसका अर्थ यह है कि दलित समाज के युवक भी शिक्ा हासिल करके आगे आए और अपनी मेहनत की दम पर समाज और रा्ट्र क्याण में अपनी ऊर्जा को लगाए । पर ्या वर्तमान में ऐसा हो रहा है ? या दलित समाज के कथित नेता ्या डॉ आंबेडकर के सपनों का भारत बनाने के लिए प्रयत्शील हैं ? ्या दलित समाज के क्याण समबनधी मांगों में रा्ट्र क्याण का भाव भी मौजूद है ?
समाज और सामाजिक शस्हियों एवं मानव वयवहार का विश्लेषण करने वाले इस प्रश्न का उत्र नहीं में ही देंगे । कारण यह है कि सविंत्रता के बाद अगर धयान दिया जाए तो देश के विभिन्न हिससों में दलित क्याण और विकास की मांग को लेकर कई दलित नेता सामने तो आए , पर सत्ा मिलने के बाद जब उनके सामने दलित समाज के वासिहवक क्याण और विकास समबनधी उपयोगी कदम उठाने की बारी आयी तो अधिकतर नेता दलित समाज को अपने वादों की दम पर भ्रमित करने और काम निकलने की मानसिकता में ही जीते रहे । दलित समाज के लिए ऐसे तमाम नेता शायद ही कुछ सकारातमक कदम उठाने में सफल रहे होंगे ्योंकि उनके तमाम दावों के बावजूद दलित समाज आज भी अपने विकास और क्याण की राह देख रहा है ।
आज देश का सामाजिक वातावरण सामानय नहीं है । जाति , धर्म और संप्रदाय के साथ क्ेत्रीयता में बंटिा आम आदमी रा्ट्रभाव से अलग होकर सवहित तक सिमटि कर रह गया है । दूहर्ि राजनीतिक एवं आर्थिक हचिंतन के मधय सांसकृहिक हचिंतन लगभग समापि हो चिुका है । हिनदू समाज में जातिगत भेद और दलित जातियों के साथ अनय जातियों के लोगों के मानस में स्ाहपि अवयवहारिक एवं अवैज्ाहनक तथय , हिनदू समाज के सामाजिक सौ्ठव की दिशा में भारी अवरोध है । दुर्भागय से दलित वर्ग के साथ सामाजिक हीनता उनकी नियति बना हुआ है । इसलिए यह हवचिार करना ही होगा कि हिनदू समाज के इस बड़े एवं अभिन्न हिससे को किस प्रकार सामाजिक शक्ि प्रदान करके उनकी सभी समसयाओं का समाधान किया जा सकता है ?
सविंत्रता के लगभग सत्र साल बाद आज भारत की शस्हि बिलकुल विपरीत है । अब यह देश एक आणविक समपन्न महाशक्ि के रूप में हव्वमंचि पर स्ाहपि है । इसके बावजूद यदा-कदा देश की छवि को क्हि पहुंचिाने के लिए योजनाबद्ध रूप से मिथया एवं भ्रमातमक हवर्यों एवं दलित समाज की समसयाओं के माधयम से अधिक दु्प्रचिार किया जा रहा है और दलित समाज के तथाकथित वर्तमान रखवाले , कांग्ेस और वामपंथी र्ड्ंत्र के अनुरूप दलित जाति के उतपीिन और अत्याचार के लिए मोदी सरकार को जिममेदार ठहरा कर अपने सवा्षों को पूरा करने के लिए एकजुटि हैं । सुनियोजित रणनीति के तहत ऐसा प्रचिार किया जा रहा है कि दलित समाज की दीं एवं दयनीय दशा के लिए तथाकथित हिनदू समाज की कुछ जातियां ( ब्ाह्मण और ठाकुर ) ही जिममेदार हैं । इतना ही नहीं , तथाकथित विद्ानों द्ारा ऐसा प्रचिारित कराया जा रहा है कि दलित जातियां हजारों वर्षों से हिनदू समाज में हैं और इनके निर्माण के पीछे वर्ण वयवस्ा का हाथ है । जबकि वासिहवकता में ऐसा नहीं है । भारत में दलित जातियों का उदय विदेशी मुशसलम आरिांिाओं के शासनकाल में हुआ था । मुशसलम आरिांिाओं से लेकर अंग्ेजों और फिर सविंत्रता भारत में कांग्ेस , वामपंथियों और अनय हिनदू विरोधी मानसिकता वाले दलों एवं
नेताओं ने दलित समाज को भ्रमित करने और उनिें अपने हितों के लिए इसिेमाल करने का काम किया । समयपरिवर्तन के साथ दलित समाज अपने विकास और समग् क्याण के लिए उनिीं ततवों पर निर्भर होता चिला गया जो ततव दलितों को उनके अपने अंधेरे से बहार निकलने ही नहीं देना चिाहते हैं । ऐसे ही ततव अब " जय भीम-जय मीम " का नारा देकर दलित-मुशसलम राजनीतिक गठजोड़ के माधयम से सत्ा हासिल करने की फ़िराक में हैं ।
डॉ आंबेडकर ने कहा था कि किसी भी लोकतंत्र का निर्माण वहां के रहने वाले लोगों के सामंजसय और तौर-तरीकों से होता है । भारतीय समाज जीवन पूर्ण रूप से जातिवाद पर आधारित है , यदि समाज में निम्न वर्ग को हशहक्ि कर देंगे तो जाति वयवस्ा को उखाड़ फेंक देगा और हम लोकताशनत्रक वयवस्ाओं को ही मजबूत करेंगे और भारत के लोकतंत्र को सुरहक्ि हाथों में पंहुचिा देंगेI इसलिए बेहतर तो यह होगा कि दलित समाज अपने उन कथित नेताओं का बारीकी से खुद मू्यांकन करे कि जो उनिें सवहण्यम सपने दिखा कर मोदी सरकार और उनकी नीतियों का विरोध करने के प्रेरित कर रहे हैं । दलित समाज को एकजुटि होकर उन शक्िओं को भी जवाब देना होगा जो उनके क्याण और विकास के नाम पर अपना भारत विरोधी एजेंडा चिलाने की फ़िराक में हैंI दलित समाज में आज नेतृतव के अनेक सिर उभर आए हैं । वयश्िगत राजनीतिक महतवाकांक्ाओं की टिकरािटि दलित राजनीति को कमजोर कर रही है । ऐसे में यह आव्यक हो जाता है कि डॉ आंबेडकर के आदशषों के प्रति वासिहवक रूप से अपनी प्रतिबद्धता दिखाई जाए और दलित राजनीति को महतवाकांक्ाओं की टिकरािटि , भाई-भतीजावाद , सत्ा प्राशपि की होड़ से दूर करके हम उस भारत का निर्माण के लिए मिलकर कार्य करें , जिस भारत का सपने डॉ आंबेडकर ने देखा था । यही बाबा साहब को सच्ी श्रद्धांजलि होगी । �
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