eMag_Dec 2020_Dalit Andolan | Page 6

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डॉ . आंबेडकर के सपने का भारत

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दिसंबर 1956 को भारत ने एक महान आतमा , एक महान सपूत , एक महान रा्ट्रवादी और एक महान वयश्ितव को खो दिया । नई हद्ली के आवास पर जिस महान नेतृतव ने अपने देह को तयाग दिया था , वह और कोई नहीं , बल्क संविधान निर्माता डॉ भीमराव रामजी आंबेडकर थे । डॉ आंबेडकर एक ऐसे वयश्ितव भी थे , जिनिें आर्थिक नहीं , बल्क सामाजिक कलंक के कारण अपने जीवन में संघर््य करना पिा । अपने ज्ान , बुद्धिमत्ा और मानवीय भावनाओं के साथ उनिोंने सिद्ध कर दिया कि कोई जाति से महान नहीं हो सकता है , वरन कोई वयश्ि केवल कमषों से महान हो सकता है । एक वयश्ि , एक नयायविद् , एक अर्थशासत्री , एक राजनीतिज् , एक समाज सुधारक , एक विपुल लेखक और एक समाजशासत्री के विखयाि डॉ आंबेडकर भारतीय संविधान के वासिुकार थे , जिसके लिए आज समपूण्य भारत गर्व का अहसास करता है ।
आधुनिक भारत की तसवीर को गढ़ने में बाबा साहब की भूमिका को कभी भी अनदेखा नहीं किया जा सकता । बाबा साहब ने एक ऐसे रा्ट्र के निर्माण का सपना देखा था , जहां समग् विकास के माधयम से सभी नागरिकों को विकास यात्रा में सहभागी बनाया जाएI आधुनिक भारत की नींव रखने में बाबा साहब का उ्लेखनीय योगदान है । भारतीय रिजर्व बैंक , नेशनल पॉवर कारपोरेशन , रा्ट्रीय जल बोर्ड , भारत की औद्ोहगक नीति , रोजगार कार्यालय , विदेश नीति , श्रम क़ानून , महिलाओं के लिए अनिवार्य मातृतव अवकाश सहित कई अनय नीतियों एवं संस्ानों को स्ाहपि करने में बाबा साहब की महतवपूर्ण भूमिका रही और सविंत्र भारत के निर्माण में अपना योगदान दियाI
देखा जाए तो डॉ आंबेडकर ने समपूण्य भारत वर््य को एक रा्ट्र के रूप में सवीकार किया था । उनका मानना था कि इस रा्ट्र की निर्मिति कोई सौ या दो वर््य में नहीं हो गयी है । इसको प्रकृति , समाज एवं उसकी संसकृहि ने एक रा्ट्र के अखंड सवरुप के साथ निर्मित किया है । देश की एकता और अखंडता इस रा्ट्र की सवाभाविक प्रकृति है । बाबा साहब के मन में यह हवर्य अनानास रूप से नहीं आया था । सविंत्रता से पूर्व अंग्ेजों ने अपनी कुहटिल नीति के कारण जब यह भ्रम फैलाया था कि भारत एक रा्ट्र नहीं , बल्क रा्ट्रों का एक समूह है । उस समय डॉ आंबेडकर आल इण्डया डिप्रैसड ्लासेस कांग्ेस के नागपुर अधिवेशन में 1930 में अधयक् के रूप में दिए अपने भार्ण में इसका विरोध करते हुए कहा था कि भारत एक रा्ट्र है और भारत की विविधता में एकता के ही दर्शन होते हैं और उसी सांसकृहिक एकातमकता के परिणामसवरूप भारत सिर्फ एक रा्ट्र है । इस प्रायद्ीप को छोड़कर संसार का कोई भी दूसरा देश ऐसा नहीं है , जिसमें इतनी सांसकृहिक समरसता हो । हम केवल भौगोलिक दृष्टि से सुगठित नहीं हैं , बल्क हमारी सुनिश्चित एकता भी अविच्छन्न और अटिूटि है जो पूरे देश में चिारों दिशाओं में वयापि हैI डॉ आंबेडकर ने इस बात को आग्िपूर्ण तरीके से कहा था कि यह रा्ट्र हजारों वर्षों से एक बना है तो इसकी एकता को बनाये रखने के लिए आगे प्रयास ्यों नहीं किये जा सकते हैं ?
डॉ आंबेडकर के इस हवचिार पर हचिंतन करते हुए भारत के वर्तमान दृ्य पर धयान दिया जाए तो दलितों पर होने वाले कथित अत्याचार को लेकर तमाम दलित नेता तनाव में नजर आ रहे हैं । जनता के बीचि अपने कथित तनाव की हचिंता जताने वाले तमाम नेता एक सुनियोजित रणनीति के तहत यह प्रचिारित करने में लगे हैं कि भाजपा नेता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राज में दलित सुरहक्ि नहीं हैं और अगर दलितों का क्याण करना है तो मोदी सरकार को सत्ा से दूर करना होगा । सविंत्र भारत में शुरू हुई लोकताशनत्रक प्रहरिया में दशकों तक दलितों को कांग्ेस के पारमपरिक वोटि बैंक के रूप में देखा जाता रहा । दलितों और मुशसलमों को डरा-समझा कर वोटि हासिल करने और फिर सत्ा सुख उठाने वाली कांग्ेस ने , दोनों वगषों का दशकों तक शोर्ण किया और उनिें अपने हित के लिए इसिेमाल किया । समय परिवर्तन के साथ दलित वोटि बैंक अपने वासिहवक हितों के लिए कांग्ेस से टिूटि कर , उन दूसरे दलों के पास पहुंचि गया , जो कि राजनीति में दलित समाज का समग् क्याण करने और उनके समुहचिि विकास के तथाकथित लक्य को लेकर सामने आये । पर दलित क्याण के नाम पर आने वाले ऐसे तमाम दलों ने भी दलितों का सिर्फ वोटि बैंक के रूप में इसिेमाल किया और सवहितों के साथ ही दलित विकास को अवैध कमाई और धन हासिल करने का एक माधयम बना दिया । खेदजनक यह भी है कि इसके लिए बाबा साहब डॉ आंबेडकर के नाम का अपनी सुविधानुसार इसिेमाल किया और लगातार कर रहे हैं ।
वर्तमान दौर में दलित क्याण के नाम पर सामने आए तमाम नेता डॉ आंबेडकर का नाम लेकर दलित समाज को भ्रमित करके अपने सवा्षों की पूर्ति के लिए प्रयासरत हैं । ऐसे नेता डॉ आंबेडकर के मूल हवचिारों से अनजान हैं और उनिें यह भी नहीं पता कि दलित समाज के क्याण के लिए बाबा साहब का उद्े्य ्या था और वह किस तरह से दलित समाज के क्याण को रा्ट्र के समपूण्य विकास से समबद्ध करके देखते थे ? ऐसे दलित नेताओं का शायद भी पता होगा कि बाबा साहब का पूरा जीवन इस बात का उदाहरण है कि
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