शयाि वर्ण के भषी थे । उनहोंने ऋगिेद के हवाले से लिखा“ असशिनषी देवों ने शयाि व रूक्तषी का विवाह कराया । शयाि शयाि वर्ण का था और रूक्तषी गोरषी । अशिनषी देव ने गौर वर्ण कषी वंदना कषी रक्ा कषी थषी ।” डा. आमबेडकर का निषकष्व है कि“ आयगों में रंगभेद कषी भावना नहीं थषी ।” आयवो में काई भेद नहीं था ।” आर्य जाति के उपासय श्रषीराम शयाि रंग के थे और श्रषीकृषण भषी । ऋगिेद के एक ऋषि दषीघ्वतमस भषी गोरे रंग के नहीं शयाि रंग के थे ।
वैदिक काल में एक समान थे सभी
ऋगिेद में संसार प्राकृतिक विकास का परिणाम है । वर्ण वयिसथा सामाजिक विकास के रिि में विकसित हुई और जाति भषी । सभषी आर्य एक समान थे । सभषी िणवो में आत्मीय समबंध थे । मनुस्मृति( 10.64) में कहा गया है कि शूद्र रिाह्मणति को प्रापत होता है और रिाह्मण शूद्रति को । भिन्न-भिन्न वर्ण में वैवाहिक समबंध थे ।” धर्म सूत्ों में कहा गया है कि शूद्रों को वेद नहीं पढ़ना चाहिए लेकिन इससे भिन्न विचार भषी थे । छानदोगय उपनिषद् में राजा जानश्रुति शूद्र थे । उनहें रैकि ऋषि ने वैदिक ज्ञान
दिया था । ऋषि कवष एलूस शूद्र थे । ऋषि थे । ऋगिेद के दसवें मणडल में उनके सूकत हैं । भारद्ाज श्रौत् शूद्र को भषी यज्ञ कर्म का अधिकार देता है । धर्म सूत्ों में शूद्र को सोमरस पषीने का अधिकार नहीं दिया गया । इनद्र ने असशिवन को सोम पषीने का अधिकार नहीं दिया । सुकनया के ितृद्ध पति चयिन को अविनषी देवों ने यौवन दिया था । चयिन ऋषि ने इनद्र को बाधय किया कि असशिनषी देवों को सोमरस दें । यह वहषी चयिन है जिनके नाम पर आयुिदेद का चयिनप्रास चलता है । शूद्रों को समान अधिकार देने कषी अनेक कथाएं हैं । लेकिन बाद कषी वर्ण वयिसथा के समाज में उतपादन और श्रम तप वाले शूद्रों कषी ससथवत कमजोर होतषी रहषी ।
शूद्र शबद वर्ण सूचक नहीं: बाबा साहब
शूद्र आर्य थे । हम सबके पूर्वज थे । डा. आमबेडकर ने लिखा है कि पहले शूद्र शबद वर्ण सूचक नहीं है । यह एक गण या कबषीले का नाम था । भारत पर सिकंदर के आरििण के समय सोदरि नाम का गण लड़ा था । पतंजलि ने महाभाषय में शूद्रों का उललेख आिषीरों के साथ किया है । महाभारत के सभा पर्व में शूद्रों के गण
संघ का उललेख है । विषणु पुराण, माककेणडेय पुराण, रिह्म पुराण में भषी शूद्रों के गण संघ का उललेख है ।” शूद्र गुणवाचषी है । अब वर्ण वयिसथा कालवाह्य हो गई लेकिन उसके अवशेष अभषी भषी हैं । यज्ञ आदि कर्मकाणड के समय उनहें समिान जनक सथान नहीं मिलता । यह दशा त्ासद है । वे पूजा, यज्ञ उपासना में केन्द्रीय भूमिका नहीं पाते । जातियां कालवाह्य हो रहषी हैं । कुछ समय पूर्व उ0प्र0 विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदषीप दुबे के खेत में खुदाई के समय एक प्राचषीन शिव मूर्ति मिलषी । संयोग से यह शिवरावत् का दिन था । दुबे ने शिव उपासना कषी । यज्ञ कराया और अनुसूचित जाति के एक वरिषठ को पुरोहित बनाया । उपससथत जनसमुदाय ने उनसे प्रसाद लिया । उनहें प्रणाम किया । मुझे आशा है कि लोग इससे प्रेरित होंगे । दुबे के इस अनुसूचित जाति के नेततृति वाले कर्मकाणड में कोई निजषी हित नहीं था ।
शूद्र को नीचे की जाति मानना दुर्भागयपूर्ण
ऋगिेद में रिाह्मण शबद आया है । रिाह्मणों के साथ अनय लोग भषी यज्ञ में ससमिवलत होते थे । यज्ञ आयवो का प्रमुख अनुषठान था । सभषी रिाह्मण यज्ञ विज्ञान के जानकार नहीं थे । ऋगिेद में एक मंत्( 8.58.1) में प्रश्न है कि“ इस यज्ञ में नियुकत हुआ है उसका यज्ञ समबंधषी ज्ञान कैसा था?” ऋगिेद में यज्ञ कर्म में योगय रिाह्मण नियुकत किए जाते थे । यहषी यज्ञ कर्म में नियुकत रिाह्मण कषी योगयता जरूरषी है । यज्ञ के प्रोटोकाल में रिाह्मण होता के नषीचे बैठता था । ऋगिेद के समाज में कवि ऋषि सबसे जयादा समिावनत हैं । ऋषि कवि हैं । रिाह्मण मंत् रचना नहीं करते थे । वे मंत्ों का प्रयोग करते थे । मंत् पढ़ते थे । ऋगिेद में रिाह्मण शबद का अर्थ मंत् या सतुवत भषी है । एक ऋषि कहते हैं कि देव इनद्र तेरे लिए मैं नए रिाह्मण रचता हूं । रिाह्मण का अर्थ कविता भषी है । वर्ण धषीरे-धषीरे जाति बने । लेकिन रिाह्मण वर्ण हषी रहे । इस वर्ग में जातियां नहीं हैं । इसषी तरह क्वत्य और वैशय वर्ग में जाति नहीं है । शूद्र वर्ग में काम और वयिसाय आदि के कारण
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