Dec 2025_DA | страница 39

जो समानता, बंधुता व सितंत्ता जैसे जनतांवत्क मूलयों पर आधारित है ।
दलित विषयक साहितय का समाज बोध पाठक और श्रोता कषी चेतना एवं अनुभूति को प्रभावित करनेवालषी गहन संवेंदना से हषी पूरा होता है । साहितय पर समय और समाज का सपषट प्रभाव
होता है । साहितया कषी रचनाओं में मनुषय कषी मससतषक पर पड़नेवाले जषीिन और जगत कषी घटना और ससथवतयों का हषी प्रतिबिंब होता है । दलित विषयक साहितय कषी मानयता है कि कला या साहितय को सामाजिक दायिति का निर्वाह करते हुए कला सतृजन में आगे बढ़ना चाहिए । इस दृष्टि से दलित विषयक साहितय शुद्ध कला न होकर एक सामाजिक आंदोलन है ।
हिंदषी दलित विषयक उपनयास यह सामाजिक सरंचना कषी तह में जाकर पूरे समाज कषी न केवल पड़ताल करता है बसलक उसमें छुपषी हुई विसंगतियों को उजागर कर उसके प्रतिकार और परिषकार का प्रयत् भषी करते हैं । सुअरदान उपनयास में यह देख सकते है,“ तषीन बेटियों का मानना था आदिषी जाति से नहीं बसलक कर्म से बड़ा होता है । जातिवाद, ऊँच-नषीच कषी भावना समाज में यह कोढ कषी तरह है । यदि इसका इलाज न किया गया तो पूरा समाज रोगषी बन जायेगा ।” भारतषीय संदर्भ में यह वर्ण-वयिसथा
का विरोध करके समरस समाज के साथ-साथ मानव मात् कषी गरिमा को सथावपत करना चाहता है । सामाजिक संकषीण्वता और विसंगितों से मानव मात् को मुकत करना तथा दलित पीड़ित मानवता को समानता व समिान दिलाना हषी इस उपनयास का उद्ेशय हे । इसलिए प्रथमत: और अंतत: भषी इसके लक्य और सरोकार समाजबोध हषी है ।
छपपर उपनयास में चंदन ने अगला सवाल किया –“ तो इसका मतलब यह हुआ कि तुमहारषी जो आज दषीन-हषीन हालत है, तुम जो रोजषी-रोटषी के लिए दूसरों के मुंहताज हो और तुमको नषीच, अछूत या हेय मानकर दूसरे लोग तुमसे जिस प्रकार घतृणा और उपेक्ा का वयिहार करते है, तुम जो शोषण, अपमान और अतयाचार के शिकार हो इस सबका कारण ईशिर है वहीं तुमहारषी दूर्दशा कर रहा है ।” सदियों के शोषण, प्रताड़ना, द्ेष और वैमनषय के भेदभाव तले दबा दलित समाज भारतषीयों कषी सांसकृवतक विरासत और समाज वयिसथा को आज इसषी दृष्टि से देखता है । इस समाज कषी जो दशा हुई है यहाँ कषी धार्मिक परंपरा, ईशिर का डर यहषी बात इस उपनयास चंदन समाज के सामने रखता है । इतिहास में ऐसे अनेक घटनाएँ घटित हुई है जिनके पषीछे जाति ने गहरषी साजिश रचषी है । देश और समाज के विघटन में भषी महतिपूर्ण भूमिका निभाई है । जब-जब भषी बाहरषी आरिांताओं से समुच्चय देश को एकसाथ मिलकर टकराने कषी जरुरत पड़ी, जाति में बटाँ समाज एकसाथ जूडने में असमर्थ हषी दिखाई दिया और देश को लगातार पराजयों का मुँह देखना पड़ा । इन पराजयों से भषी हमने कुछ नहीं सषीखा कयोंकि देश से बड़ा जातषीय गौरव था । जिस भ्रम ने इस देश को हजारों साल गुलाम बनाकर रखा । देश को गुलाम बने रहना मंजुर था लेकिन जाति को छोड़ना या इसे छोड़ना धर्म का हिससा था, जिसे विद्ान ईशिरषीय आदेश सिद्ध करने में लगे हुए थे ।
दलित उपनयास इन सबके विरोध खडे है । वो भारतषीय समाज में समता व सितंत्ता का पक्धर है । मनुषय कषी अससिता एवं समिान को सिवोपरि मानता है । भारतषीय समाज वयिसथा को दलितों कषी विपन्नता, निरक्रता, सामजिक
उतपषीड़न, विद्ेष, हषीनताबोध, गरषीबषी, दुख का कारण मानता हैं । कयोंकि भारतषीय समाज वयिसथा ने दलितों पर सिर्फ अस्पृशयता हषी नहीं थोपा बसलक उनपर कडे और कठोर दंड भषी लागू किए । जिसे धर्म, सतिा और साहितय ने अपना समर्थन दिया ।
मुसकतपर्व यह सामाजिक उपनयास है । इसमें दलित जषीिन का वचत् है, दलित जषीिन कषी विसंगति और समसयाएँ है और दलित शोषण- उतपषीड़न कषी वयथा कथा है ।“ भई महारा इकलले का छोरा थोडा हषी है सुनषीत तो सारषी बस्ती का हो गया है अब ।” सुनषीत ने समाज में वयापत जातिभेद देखा था और उसके विरोध में आवाज भषी उठाई थषी । प्राथमिक पाठशाला में पढ़ते समय वो पुसतक में छपे वचत् पर शंका प्रकट करते हुए पूछता है पयाऊ पर बैठा आदिषी नलकषी से दूर से दलितों को पानषी पिलाता है । इस वचत् में नलकषी कयों नहीं है? सुनषीत बच्चों और मासटरजषी के साथ पयाऊ पक जाकर पंडितजषी को ललकारता है और नलकषी खींचकर फेंक देता है । छोटे बच्चे का इतना साहस और पोलिस का भय देखकर वह सुनषीत कषी बात से सहमत हो जाता है । आजादषी मिलने के पाँच-छह बरस बितने के समय के सामाजिक वातावरण के लेखक ऐसषी कलपना कर सके कि पाँच-छह का दलित बालक भषी पंडित को भयभित करे उसे जातिभेद मानने से रोक सकता है । इसे आजादषी के पर्व के साथ दलितों का मुसकतपर्व हषी मानना चाहिए । यहषी बालक एक दिन पूरे बस्ती के लिए लड़ता है । यह समाजबोध मुसकतपर्व उपनयास में दिखाई देता है ।“ दलित उपनयास हषी लोगों का संसकृवत विमर्श और सामाजिक ऐतिहासिक पड़ताल है इसलिए इसकषी सामाजिकता और सामाजिक प्रतिबद्धता पारंपारिक साहितय से बिलकुल अलग दिखाई पड़तषी है ।“ इस प्रकार हिंदषी दलित उपनयास का इतिहास एवं समाज बोध मुखयधारा से बिलकुल भिन्न है । वो मानिषीय श्रम को हषी सौंदर्य और वयिसथा कषी अनयायपूर्ण विसगंतियों से मुसकत को हषी अपना सामाजिक सरोकार और अपनषी समाजिकता मानता है उसके केंद्र में केवल और केवल मनुषय व मनुषयता है । �
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