Dec 2025_DA | Seite 38

साहितय

हिंदी दलित रर्षयक उपन्ासों में इतिहास एर्ं समाजबोध

माधनुरे गंगाधर पोचिराम

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तिहास कषी बात चलतषी है, तो आम तौर पर यह समझ लिया जाता है कि वह राजा महाराजाओं के साम्ाजयों उनकषी शासन पद्धतियों और जय- पराजय कषी गाथाओं का लेखा-जोखा है । अभषी तक ऐसे हषी इतिहास लिखे भषी गए हैं, इसलिए इतिहास के बारे में यहषी गलत धारणा रुढ़ हो गई है । भारत का इतिहास इनहीं धारणाओं के कारण एक वंश का अभिलेख मात् बनकर रह गया है ।
मैं आपको यह बताना आवशयक समझता हूँ कि इसषी गलत इतिहासबोध के कारण लोगों ने दलितों और ससत्यों को इतिहासहषीन मान लिया है । जबकि भारत के इतिहास में उनकषी भूमिका महतिपूर्ण है । वे इतिहासवान है, सिर्फ जरुरत दलितों और ससत्यों द्ारा अपने इतिहास को खोजने कषी है । इस संदर्भ में वरिषठ दलित चिंतक कंवल भारतषी कहते है कि –“ डलॉ. आंबेडकर पहले भारतषीय इतिहासकार है जिनहोंने इतिहास में दलितों कषी उपससथवत को रेखांकित किया है ।” दलित विषयक रचनाकार इन बिंदुओं को पकड़कर अपनषी रचना के द्ारा समाज के सामने रख रहा है । हिंदषी दलित उपनयास कषी बात करें तो रुपनारायन सोनकर के‘ डंक’ उपनयास में देख सकते है और वे कहते है कि –“ इतिहास बताता है कि आर्य लोगों ने बाहर से आकर इस देश के मूलनिवासियों यानषी अनायगों पर कबजा कर लिया था । अनार्य और कोई नहीं बसलक इस देश के दलित और पिछ़डे वर्ग के लोग थे । आर्य ने राजनषीवत, सतिा, अर्थ, ज्ञान, विज्ञानपर अपना प्रभुति जमा लिया था । शसकतशालषी बन गए थे । यहाँ के मूलनिवासों यानषी अनायगों को विकास
करने का मौका नहीं दिया था । आज भषी उनकषी संताने वहषी संताप भोग रहषी है ।”
आज का दलित डलॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के कार्य और विचारों के कारण अपना इतिहास सियं जान रहा है और लिख रहा है । इसषी कारण दलित विषयक उपनयास में हमें इतिहास बोध होता है । दलित विषयक साहितय सामाजिक, सांसकृवतक पतृषठभूमि के आधारपर विकसित हो रहा है । उसने अपना अलग रचना संसार निर्मित किया है, जो हमें अपने इतिहास संसकृवत और सभयता के विभिन्न पक्ों से अवगत करातषी है । कयोंकि दलित वर्ग कषी संसकृवत एवं सभयता सबसे पुरानषी है । उसका अहसास आज के दलित उपनयासों में बराबर हो रहा है ।“ द्रोणाचार्य ने एकलवय से अंगुठा कया इसलिए माँगा कि धनुषय विद्ा में वह और भषी प्रिषीण न हो जाये? कया द्रोणाचार्य गुरु होकर भषी नहीं चाहते थे कि एकलवय जैसा शिषय उतनषी प्रगति न करें कि उसके अपने शिषय पषीछे रह जाये ।” इस उपनयास के संदर्भ से यह सपषट होता है कि दलित समाज के साथ हमेशा षडयंत् रचा गया है ताकि वो आगे ना आये । आज के युग में द्रोणाचार्य अंगुठा नहीं काटेगा बसलक अंक काटेगा, यह इतिहास बोध दलितों का है । हिंदषी दलित विषयक उपनयास का इतिहास बोध उनहें अपनषी संसकृवत और सभयता से परिचित करता है तो दूसरषी ओर भारतषीय संसकृवत, वैदिक संसकृवत यानषी हिंदूवादषी संसकृवत के मानवता विरोधषी चररत् को उदघावटत करके समसत इतिहास और परंपरा को नकार देतषी है । दलितों के इतिहास में दलित महिलाओं का भषी बहुत बडा योगदान रहा है इस बात को भषी हर हिंदषी दलित विषयक उपनयास में देख सकते है ।“ कालषी चंडषी दुर्गा का मैं रुप हूँ । दूर्गा
कालषी चंडषी सभषी दलित महिलाएँ थषी । वे सभषी देवियाँ नहीं बसलक कर्मयोगषी महिलाएँ थषी, जो भषी कामुक व दुराचारषी वयसकत उनके पास गया था वह तरा नहीं मरा था ।”
इस भारतषीय हिंदूवादषी वयिसथा में दलित महिलाओ के साथ भषी अनयाय-अतयाचार करके उनके कर्मयोगषी इतिहास को दबाकर अपना वर्चसि सथावपत किया है । हिंदषी दलित विषयक उपनयास इन सभषी प्रकार के इतिहास को समाज के सामने प्रसतुत कर रहा है । इस संदर्भ में हरिनारायन ठाकुर कहते है कि –“ दलित विषयक साहितय आंबेडकरवादषी सोच पर आधारित है, इसलिए इसकषी सामाजिकता वर्तमान समाज वयिसथा को परले सिरे से खारिज करतषी है । उसका इतिहास बोध भषी मुखयधारा के इतिहास से बिलकुल भिन्न है ।”
अत: सपषट है कि इस आशा के साथ हिंदषी दलित विषयक उपनयास का मुखय सरोकार अपनषी संसकृवत, परंपरा और इतिहास में अपनषी पहचान तथाअपनषी अससिता कषी खोज करना
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