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विषमता को मिटाने के लिए जोतिबा फुले और सावित्ीबाई फुले का योगदान अविसमरणीय है । जोतिबा फुले ने इन विषमताओं को लेकर एक किताब‘ गुलामगिरी’ लिखी, जिसका अंग्ेजी में भी अनुवाद हो चुका है । इस किताब में उन्होंने बाह्मणवाद के खिलाफ संघर्ष, सत्ी शिक्षा, किसानों और खेतिहर मजदूरों, दमितों-दलितों, शोषितों को आवाज देने का काम किया ।

समाज

साहूजषी महाराज ने किया और लोगों ने अपने- अपने समय पर आंदोलन चलाया । आगे चलकर डलॉ. आमबेडकर ने राजनषीवतक आंदोलन बहुत वयापक रूप में पूरे देश में चलाया । उतिरप्रदेश में भषी आमबेडकर के आंदोलन का बहुत गहरा प्रभाव और प्रसार हुआ । शुरुआत में दलित आंदोलन और दलित साहितय का ओबषीसषी के नायकों ने विकास किया । इसे अगर देश के सतर पर देखें तो जोतिबा फुले ओबषीसषी थे । साहूजषी महाराज ओबषीसषी थे । पेरियार ओबषीसषी थे और उतिर भारत में ललईसिंह यादव,
रामसिरूप वर्मा और सभषी लोग दलित आंदोलन के मजबूत पक्धर थे । इन लोगों ने आंदोलन चलाया और उसको आगे बढ़ाया । इनहोंने दलितों कषी समसयाओं और समाज में उनकषी ससथवत को लेकर नाटक लिखे । आशचय्व कषी
बात है कि दलित इनके महति को मानते हैं, लेकिन ओबषीसषी के लोग जानते हषी नहीं कि रामसिरूप वर्मा या ललईसिंह यादव कषी किताब कया है? इन लोगों ने दलितों के नायकों पर नाटक लिखे । ललई सिंह यादव ने पांच नाटक लिखे, जिनमें शमबूक वध और एकलवय काफषी प्रसिद्ध हैं । इस तरह वर्चसििादषी वयिसथा के खिलाफ लंबा आंदोलन चला है, बाद में लालू प्रसाद यादव, मुलायम और मायावतषी ने इसका विकास किया, लेकिन बाद में ये लोग सतिा कषी राजनषीवत करने लगे । यानषी राजनेता से इतर
विषमता को मिटाने के लिए जोतिबा फुले और सावित्ीबाई फुले का योगदान अविसमरणीय है । जोतिबा फुले ने इन विषमताओं को लेकर एक किताब‘ गुलामगिरी’ लिखी, जिसका अंग्ेजी में भी अनुवाद हो चुका है । इस किताब में उन्होंने बाह्मणवाद के खिलाफ संघर्ष, सत्ी शिक्षा, किसानों और खेतिहर मजदूरों, दमितों-दलितों, शोषितों को आवाज देने का काम किया ।
ये लोग पिछड़ों-दलितों के बषीच सामाजिक परिवर्तनकारषी राजनषीवत नहीं कर सके । इनकषी राजनषीवत कुसजी तक सषीवित हो गई ।
विषमता को मिटाने के लिए जोतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले का योगदान अविसिरणषीय
है । जोतिबा फुले ने इन विषमताओं को लेकर एक किताब‘ गुलामगिरषी’ लिखषी, जिसका अंग्ेजषी में भषी अनुवाद हो चुका है । इस किताब में उनहोंने रिाह्मणवाद के खिलाफ संघर्ष, सत्री शिक्ा, किसानों और खेतिहर मजदूरों, दमितों- दलितों, शोषितों को आवाज देने का काम किया । फुले दंपवति के शिक्ा खासकर सत्री शिक्ा के लिए योगदान को इसषी से समझा जा सकता है कि उनहोंने महाराषट्र में ससत्यों के लिए पहला सकूल खोला, जोकि भारत में भषी महिलाओं का पहला सकूल था । सत्री शिक्ा कषी दिशा में फुले दंपवति द्ारा उठाए गए इस कदम का सिणगों ने खासा विरोध किया । सवर्ण समाज में सत्री शिक्ा वर्जित थषी, सवर्ण महिलाएं तो दलितों से भषी महादलित थीं । वे 100-150 साल पहले तक घर से बाहर कदम नहीं रख सकतषी थीं । एक ऐसे समाज में फुले दंपवति का सत्री शिक्ा के लिए सकूल कषी सथापना करना निशचय हषी साहसिक कदम था । सावित्रीबाई फुले घर से बाहर निकलकर पढ़ाने का काम करने वालषी पहलषी वशवक्का थीं । जब वो सकूल के लिए निकलतीं थषी, तो अपने साथ घर से हमेशा एक अतिरिकत साड़ी लेकर चलतषी थीं कयोंकि उनहें तंग करने और सत्री शिक्ा का विरोध करने के लिए उन पर गोबर और पतथर फेंके जाते थे, उन पर भद्दी फसबतयां कसषी जातषी थीं, मगर फिर भषी वे पषीछे नहीं हटीं । मगर ताज्जुब कषी बात यह है कि लेखकों ने फुले दंपवति के शिक्ा खासकर सत्री शिक्ा के क्ेत् में किए गए काम को कभषी उस तरह तवज्जो नहीं दषी, जिस तरह राजा राममोहन राय को । खास बात तो यह है कि राजा राममोहन राय के समय तक शिक्ा का काफषी प्रचार-प्रसार हो चुका था । सहषी मायनों में देखा जाए तो फुले दंपवति के संघर्ष ने महाराषट्र में दलित आंदोलन कषी नींव रखने का काम किया ।
दवक्ण भारत में दलित मसषीहा के बतौर इरोड वेंकट नायकर रामासािषी पेरियार को देखा जाना चाहिए । पेरियार ने रिाह्मणवाद के खिलाफ वहां एक ितृहद् आंदोलन कषी नींव रखषी । उनहोंने दवक्ण भारत में दलितों के मंदिरों
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