Dec 2025_DA | Página 26

विशेष

उनहें दूसरो कषी तरह बराबर के मौके मिल सकें । अगर शिक्ा, रोजगार और आवास को मौलिक अधिकार बना दिया जाता तो उनहें आरक्ण कषी वकालत कषी शायद जरूरत हषी न होतषी ।
डलॉ. आंबेडकर प्रजातांवत्क सरकारों कषी किषी से परिचित थे, इसलिए उनहोंने सधारण कानून कषी बजाय संवैधानिक कानून को महति दिया । मजदूर अधिकारों पर डलॉ आंबेडकर का मानना था कि वर्ण वयिसथा केवल श्रम का हषी विभाजन नहीं है, यह श्रमिकों का भषी विभाजन है । दलितों को भषी मजदूर वर्ग के रूप में एकवत्त होना चाहिए । मगर यह एकता मजदूरों के बषीच जाति कषी खाई को मिटा कर हषी हो सकतषी है । आंबेडकर कषी यह सोच बेहद रिांवतकारषी है, कयोंकि यह भारतषीय समाज कषी सामाजिक संरचना कषी सहषी और वासतविक समझ कषी ओर ले जाने वालषी कोशिश है ।
आंबेडकर भारतषीय दलितों का राजनषीवतक सशक्तीकरण चाहते थे । उसषी का नतषीजा है कि आज लोकसभा कषी 79 सषीटें अनुसूचित जातियों के लिए और 41 सषीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए आरवक्त कषी गई है । सरकार ने संविधान संशोधन कर यह राजनषीवतक आरक्ण 2026 तक कर दिया है । शुरू में आरक्ण केवल 10 वर्ष के लिए था । यह राजनषीवतक आरक्ण इन समूहों का कितना सशक्तीकरण कर पाया हैं, यह आज के समय का एक बड़ा सवाल है । अपना जनसमर्थन खो देने के डर से कोई भषी राजनषीवतक दल इस पर चर्चा नहीं करना चाहता ।
देखा जाए, तो दल-बदल कानून के रहते यह संभव हषी नहीं है कि कोई दलित-आदिवासषी विधायक या संसद अपनषी िजजी से वोट कर सके । हमने देखा है कि कुछ साल पहले लोकसभा में दलित-आदिवासषी सांसदों ने एक फोरम बनाया था, इन िगवो के अधिकारों के लिए, पाटजी लाइन से ऊपर उठकर । दल-बदल कानून के कारण वह बेअसर रहा है । आंबेडकर दूरदशजी नेता थे उनहें अहसास था कि इन समूहों को बराबरषी का दर्जा पाने के लिए बहुत समय लगेगा, वे यह भषी जानते थे कि सिर्फ आरक्ण से सामाजिक नयाय सुनिश्रित नहीं किया जा
सकता । हमने देखा है कि पूर्व राषट्रपति ज्ञानषी जैल सिह, बाबू जगजषीिन राम, मायावतषी जषी, आदि दलित-पिछड़े नेताओं पर किस तरह के जुमले और फिकरे गढ़े जाते रहे हैं ।
आंबेडकर का पूरा जोर दलित-वंचित िगगों में शिक्ा के प्रसार और राजनषीवतक चेतना पर रहा है । आरक्ण उनके लिए एक सषीिाबद् तरकषीब थषी । दुर्भागय से आज उनके अनुयायषी इन बातों को भुला चुके है । बड़ा सवाल यह है कि सितंत्ता के 67 सालों में भषी अगर भारतषीय समाज इन दलित-आदिवासषी समूहों को
आतिसात नहीं कर पाया है, तो जरूरत है पूरे संवैधानिक प्रावधानों पर नई सोच के साथ देखने कषी, तांकि इन िगगों को सामाजिक बराबरषी के सतर पर खड़ा किया जा सके । आंबेडकर का मत था कि राषट्र वयसकतयों से होता है, वयसकत के सुख और सितृवद्ध से राषट्र सुखषी और सितृद्ध बनता है । डलॉ. आंबेडकर के विचार से राषट्र एक भाव है, एक चेतना है, जिसका सबसे छोटा घटक वयसकत है और वयसकत को सुसंसकृत तथा राष्ट्रीय जषीिन से जुड़ा होना चाहिए । राषट्र को सिवोपरि मानते हुए आंबेडकर वयसकत को प्रगति
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