Dec 2025_DA | Seite 25

पुनः पता लगाकर तथा मानवता के अनय घटकों से सषीखकर समय समय पर आति सुधार कषी इचछा एवं क्िता दर्शाई है । सैकड़ों सालों से वासति में इस दिशा में प्रगति हुई है । इसका श्रेय आधुनिक काल के संतों एवं समाज सुधारकों स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद, राजा राममोहन राय, महातिा जयोवतबा फुले एवं उनकषी पत्नी सावित्री बाई फुले, नारायण गुरु, गांधषीजषी और डा. बाबा साहब आंबेडकर को जाता है । इस संदर्भ में राष्ट्रीय सियंसेवक संघ तथा इससे प्रेरित अनेक संगठन हिंदू एकता एवं हिंदू समाज के पुनरुतथान के लिए सामाजिक समानता पर जोर दे रहे है । संघ के तषीसरे सरसंघचालक बालासाहब देवसर कहते थे कि‘ यदि अस्पृशयता पाप नहीं है तो इस संसार में अनय दूसरा कोई पाप हो हषी नहीं सकता । वर्तमान दलित समुदाय जो अभषी भषी हिंदू है अधिकांश उनहीं साहसषी रिाह्राणें व क्वत्यों के हषी वंशज हैं, जिनहोंने जाति से बाहर होना स्वीकार किया, किंतु विदेशषी शासकों द्ारा जबरन धर्म परिवर्तन स्वीकार नहीं किया । आज के हिंदू समुदाय को उनका शुरिगुजार होना चाहिए कि उनहोंने हिंदुति को
नषीचा दिखाने कषी जगह खुद नषीचा होना स्वीकार कर लिया ।
हिंदू समाज के इस सशक्तीकरण कषी यात्ा को डलॉ. आंबेडकर ने आगे बढ़ाया, उनका दृष्टिकोण न तो संकुचित था और न हषी वे पक्पातषी थे । दलितों को सशकत करने और उनहें वशवक्त करने का उनका अभियान एक तरह से हिंदू समाज ओर राषट्र को सशकत करने का अभियान था । उनके द्ारा उठाए गए सवाल जितने उस समय प्रासंगिक थे, आज भषी उतने हषी प्रासंगिक है कि अगर समाज का एक बड़ा
हिससा शसकतहषीन और अवशवक्त रहेगा तो हिंदू समाज ओर राषट्र सशकत कैसे हो सकता है?
वे बार-बार सवर्ण हिंदुओं से आग्ह कर रहे थे कि विषमता कषी दषीिारों को गिराओं, तभषी हिंदू समाज शसकतशालषी बनेगा । डलॉ. आंबेडकर का मत था कि जहां सभषी क्ेत्ों में अनयाय, शोषण एवं उतपषीड़न होगा, वहीं सामाजिक नयाय कषी धारणा जनि लेगषी । आशा के अनुरूप उतर न मिलने पर उनहोंने 1935 में नासिक में यह घोषणा कषी, वे हिंदू नहीं रहेंगे । अंग्ेजषी सरकार ने भले हषी दलित समाज को कुछ कानूनषी अधिकार दिए थे, लेकिन आंबेडकर जानते थे कि यह समसया कानून कषी समसया नहीं है । यह हिंदू समाज के भषीतर कषी समसया है और इसे हिंदुओं को हषी सुलझाना होगा । वे समाज के विभिन्न िगवो को आपस में जोड़ने का कार्य कर रहे थे । आंबेडकर ने भले हषी हिंदू न रहने कषी घोषणा कर दषी थषी । ईसाइयत या इसलाि से खुला निमंत्ण मिलने के बावजूद उनहोंने इन विदेशषी धिगों में जाना उचित नहीं माना । डलॉ. आंबेडकर इसलाि और ईसाइयत ग्हण करने वाले दलितों कषी दुर्दशा को जानते थे । उनका
हिंदू समाज के इस सशकतीकरण की यात्ा को डॉ. आंबेडकर ने आगे बढाया, उनका दृष्टिकोण न तो संकुचित था और न ही वे पक्षपाती थे । दलितों को सशकत करने और उन्हें शिक्षित करने का उनका अभियान एक तरह से हिंदू समाज ओर राष्ट्र को सशकत करने का अभियान था ।
मत था कि धिाांतरण से राषट्र को नुकसान उठाना पड़ता है । विदेशषी धिगों को अपनाने से वयसकत अपने देश कषी परंपरा से टूटता है ।
वर्तमान समय में देश ओर दुनियां में ऐसषी धारणा बनाई जा रहषी है कि आंबेडकर केवल दलितों के नेता थे । उनहोंने केवल दलित उतथान के लिए कार्य किया यह सहषी नहीं होगा । मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि उनहोंने भारत कषी आतिा हिंदूति के लिए कार्य किया । जब हिंदूओं के लिए एक विधि संहिता बनाने का प्रंसग आया तो सबसे बड़ा सवाल हिंदू को
पारिभाषित करने का था । डलॉ. आंबेडकर ने अपनषी दूरदृष्टि से इसे ऐसे पारिभाषित किया कि मुसलमान, ईसाई, यहूदषी और पारसषी को छोड़कर इस देश के सब नागरिक हिंदू हैं, अर्थात विदेशषी उदगि के धिगों को मानने वाले अहिंदू हैं, बाकषी सब हिंदू है । उनहोंने इस परिभाषा से देश कषी आधारभूत एकता का अद्भूत उदाहरण पेश किया है ।
अमबेकडर का सपना भारत को महान, सशकत और सिािलंबषी बनाने का था । डलॉ. आंबेडकर कषी दृष्टि में प्रजातंत् वयिसथा सिवोतम वयिसथा है, जिसमें एक मानव एक मूलय का विचार है । सामाजिक वयिसथा में हर वयसकत का अपना अपना योगदान है, पर राजनषीवतक दृष्टि से यह योगदान तभषी संभव है जब समाज और विचार दोनों प्रजातांवत्क हों । आर्थिक कलयाण के लिए आर्थिक दृष्टि से भषी प्रजातंत् जरुरषी है । आज लोकतांवत्क और आधुनिक दिखाई देने वाला देश, आंबेडकर के संविधान सभा में किये गए सति वैचारिक संघर्ष और उनके वयापक दृष्टिकोण का नतषीजा है, जो उनकषी देख-रेख में बनाए गए संविधान में वरियासनित हुआ है, लेकिन फिर भषी संविधान वैसा नहीं बन पाया जैसा आंबेडकर चाहते थे, इसलिए वह इस संविधान से खुश नहीं थे । आखिर आंबेडकर आजाद भारत के लिए कैसा संविधान चाहते थे?
आंबेडकर चाहते थे कि देश के हर बच्चे को एक समान, अनिवार्य और मुफत शिक्ा मिलनषी चाहिए, चाहे व किसषी भषी जाति, धर्म या वर्ग का कयों न हो । वे संविधान में शिक्ा को मौलिक अधिकार बनवाना चाहते थे । देश कषी आधषी से जयादा आबादषी बदहालषी, गरषीबषी और भूखमरषी कषी रेखा पर अमानिषीय और असांसकृवतक जषीिन जषीने को अभिशपत है । इस आबादषी कषी आर्थिक सुरक्ा सुनिश्रित करने के लिए हषी आंबेडकर ने रोजगार के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाने कषी वकालत कषी थषी । संविधान में मौलिक अधिकार न बन पाने के कारण 20 करोड़ से भषी जयादा लोग बेरोजगारषी कषी मार झेल रहे है । बाबा साहब ने दलित िगवो के लिए शिक्ा और रोजगार में आरक्ण दिए जाने कषी वकालत कषी थषी ताकि
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