विशेष
समाज तथा देश के हितों के लिए हानिकारक होतषी है ।
थाट्स ऑन पाकिसतान
डा. आंबेडकर कषी यह बहुचर्चित पुसतक 1945 में प्रकाशित हुई । यह वह समय था जब भारत के विभाजन को लेकर पूरे देश में हलचल मचषी हुयषी थषी । इस पुसतक ने इस समसया का उचित समाधान प्रसतुत करने कषी दिशा में अपनषी महतिपूर्ण भूमिका निभायषी । इस पुसतक के संबंध में डा. आंबेडकर लिखते हैं कि‘‘ पुसतक के नाम से ऐसा लगता है जैसे पाकिसतान के बारे में एक सामानय सा खाका खींचा गया है, जबकि इसमें उसके अलावा और भषी बहुत कुछ है । यह भारतषीय इतिहास और भारतषीय राजनषीवत के सामप्रदायिक पहलुओं कषी एक विशलेषणातिक प्रसतुवत है । इसका मकसद पाकिसतान के क. ख. ग. पर प्रकाश डालना भषी है । इस पुसतक में भारतषीय इतिहास और भारतषीय राजनषीवत कषी एक झांकषी कहा जा सकता है ।’
ह्ाट कांग्ेस ए्ड गांधी हैव डन टू दी अनटचेबिलस
यह पुसतक भषी 1945 में हषी प्रकाशित हुई । इसमें कांग्ेस और गांधषी द्ारा अछूतों के लिए किये गये कायगों का लेखा-जोखा प्रसतुत किया गया है तथा सहषी कार्य न करने के लिए उनकषी अचछे से खबर लषी गयषी है । इस पुसतक में यह बताया गया है कि कांग्ेस पाटजी ने अछूतोद्धार कषी समसया को अपने राजनषीवतक लक्यों कषी प्रासपत का साधन मात् बनाया है । कांग्ेस ने अपने अछूतोद्धार काय्वरिि का जितना प्रचार किया, वासति में उतना काम नहीं किया । इसषीवलए इस पुसतक में दलित िगगों से गांधषी एवं गांधषीिाद से सावधान रहने के लिए निवेदन किया गया है ।
हू वेयर दी शूद्राज
यह ग्नथ 1946 में प्रकाशित हुआ । यह एक खोजपरक पुसतक हएै जिसमें शूद्रों कषी उतपवति के इतिहास का विशलेषण किया गया
है । इसमें बताया गया है कि‘ शूद्र’ शबद कषी उतपवति मात् शासबदक नहीं है । उसका ऐतिहासिक समबनध है । आज जिनहें शूद्र कहा जाता है वे सूर्यवंशषी आर्य क्वत्य लोग थे ।
सटे्टस ए्ड माइनोरीटीज
यह पुसतक मार्च 1947 में प्रकाशित हुई । अपनषी इस पुसतक में डा. आंबेडकर ने समाज कषी समाजवादषी रूपरेखा प्रसतुत करने का प्रयास किया है साथ हषी उनहोंने यह भषी आग्ह किया है कि राजय समाजवाद को संविधान कषी धाराओं द्ारा सथावपत किया जाय ताकि विधायिका तथा कार्यपालिका के सामानय कार्य, उनहें परिवर्तित न कर सके । राजय समाजवाद का वयािहारिक रूप संसदषीय जनतंत् द्ारा लाया जाना चाहिए, कयोंकि संसदषीय जनतंत् समाज के लिए सरकार कषी नयायोचित वयिसथा है ।
दी अनटचेबिलस
यह ग्नथ अकटूबर 1948 में प्रकाशित हुआ । इसमें छुआछूत के उतपवति के सिद्धानतों के बारे में विसतार से बताया गया है । डा. आंबेडकर ने इस पुसतक में प्रमाणों के साथ यह सिद्ध किया है कि‘‘ अस्पृशय पहले पराजित लोग थे और बौद्ध धर्म तथा गोमांस खाना न छोड़ने से उनहें अस्पृशय माना गया । उनके मतानुसार अस्पृशयता का उदगि ईस्वी सन् 400 के दरमियान हुआ होगा । उनहोंने यह साबित किया कि बौद्ध धर्म और रिाह्मण धर्म में श्रेषठता के लिए जो संघर्ष हुआ उससे अस्पृशयता पैदा हुई ।
थाट्स ऑफ लिंलगवलसटक सटेट
डा. आंबेडकर का यह महतिपूर्ण ग्ंथ 1955 में प्रकाशित हुआ । इसमें उनहोंने राजयों के भाषाई गठन का वचत्ण किया है तथा एक राजय एक भाषा के सार्वभौमिक सिद्धानत को स्वीकार किया है । हिन्दी भाषा को समपूण्व राषट्र कषी राजकषीय भाषा बनाये जाने पर बल दिया है । उनके अनुसार एक भाषा राषट्र को संगठित रख सकतषी है और समपूण्व राषट्र में शासनत तथा
विचार संचार को आसान बना सकतषी है ।
द बुद्ध ए्ड हिज धमम
वैसे तो डा. आंबेडकर द्ारा लिखित सभषी पुसतकें अपना विशिषट महति रखतषी हैं । लेकिन उनमें से भषी सबसे महतिपूर्ण सथान‘ द बुद्धा एणड हिज धमि’ का है । यह पुसतक बाबा साहेब डा. आंबेडकर के निर्वाणोपरानत सन् 1957 में प्रकाशित हो पायषी । अगर इस ग्ंथ को बौद्ध धर्म का धर्मशासत् कहा जाय तो अतिशयोसकत न होगषी । यह एक विशाल ग्ंथ है, जिसमें बौद्ध धर्म कषी विशद् विवेचना कषी गयषी है इस ग्ंथ कषी भाषा ओजस्वी एवं सारगर्भित है ।
इन पुसतकों के अतिरिकत डा. आंबेडकर के कई ऐसे सितंत् लेख जो अंग्ेजषी तथा मराठषी भाषाओं में लिखे गये हैं, जो भषी विभिन्न पत्- पवत्काओं में प्रकाशित हैं जिनका सामाजिक तथा सावहसतयक दृष्टिकोण से विशेष महति हैए जैसे लेबर एणड पार्लियामेन्ट्री डेमोरिेसषी, नषीड फाॅर चेकस एणड वैलेनसेज, माई पर्सनल
22 fnlacj 2025