एणड कमयूवनजि( 1956), दि बुद्ध एणड हिज धमि( 1957), हिनदू वुमन: राइजिंग एंड फाल ।
डा. आंबेडकर द्ारा उपरिलिखित ग्ंथों कषी विषय सामग्री बहुत वयापक है । उनकषी विशलेषण पद्धति बहुत हषी सूक्ि एवं सटषीक है । उनके कुछ प्रमुख ग्ंथों के बारे में संक्ेप में जानकारषी दषी जा रहषी है ।
कास्टस इन इंडिया
यह डा. आंबेडकर द्ारा लिखित एक लेख था, जो मई 1926 में कोलसमबया यूनिवर्सिटषी अमेरिका में पढ़ा गया था । यह बाद में 1917 में पुसतक के रूप में प्रकाशित हुआ । इसके अनतग्वत भारत में जातियों कषी उतपवति, गठन एवं विकास पर प्रकाश डाला गया है । उनकषी दृष्टि में, जाति एक ऐसा परिबद्ध वर्ग है, जो अपने तक सषीवित रहता है । उनके अनुसार जाति समसया के चार पक् हैं- हिनदू जनंसखया में विविध ततिों के ससमिश्रण के बावजूद इसमें दतृढ़ सांसकृवतक एकता है, जातियां इस विराट सांसकृवतक इकाई का अंग हैं, शुरू में केवल एक हषी जाति थषी और देखा देखषी या बहिषकार से विभिन्न जातियां बन गयषी ।
समाि होल्डिंगस इन इण्डया ए्ड देयर रेमेडीज
यह पुसतक 1918 में प्रकाशित हुई । यह छोटषी और बिखरषी हुई जोतने योगय भूमि के विसतार एवं उसके चकबन्दी से संबंधित है । डा. आंबेडकर के अनुसार जब तक छोटषी एवं बिखरषी हुई जोतने योगय भूमि का विसतार एवं चकबन्दी नहीं होगषी तब तक भारत के कृषि सुधार में प्रगति नहीं होगषी ।
दी प्राबिम ऑफ़ द रूपी
यह डा. आंबेडकर का वह शोध प्रबनध है, जिसे उनहोंने अकटूबर, 1922 में यूवनिवसटजी ऑफ लंदन में डाकटर आफ सांइस( डषी. एस. सषी.) कषी उपाधि के लिए प्रसतुत किया था । यहषी थषीवसस दिसमबर, 1923 में पुसतक के रूप में प्रकाशित हुई । इस पुसतक में डा. आंबेडकर
ने सपषट रूप से विशलेवषत किया कि मुद्रा समसया के असनति निर्णय में, किस प्रकार वरिटिश शासकों ने भारतषीय रूप कषी कषीित को पाउणड के साथ जोड़कर अपने अधिकतम लाभ का मार्ग चुना । इनकषी इस हेरा फेरषी ने हषी सभषी भारतषीय लोगों को गंभषीर आर्थिक कठिनाईयों में ढकेल दिया, कयोंकि भारतषीय धन का वरिटषीश खजाने कषी ओर निरनतर बहाव हो गया । कई ढंगों से यहां का धन वरिटिश सरकार तथा जनता के लाभ में जाने लगा ।
दी इवोलयूशन आफ दी प्रोविन्शियन फाइनेंस इन हबहटश इंडिया
यह पुसतक डा. आंबेडकर का वह शोध प्रबनध है, जिसे उनहोंने 1916 में कोलसमबया यूवनिवसटजी में पषीएचडषी डिग्री के लिए प्रसतुत किया था । इसका प्रकाशन 1924 ई0 में हुआ । यह पुसतक महाराजा बड़ौदा नरेश श्रषीिंत सयाजषी राव गायकवाड को समर्पित कषी गयषी है । उललेखनषीय है कि महाराजा ने हषी उनहें अमेरिका में शिक्ा ग्हण करने हेतु भेजा था । यह पुसतक फाइनेंस से संबंधित है, जिसमें वरिटिश नौकरशाहषी का बुरषी तरह से भणडाफोड़ किया गया है ।
एनाहिलेशन ऑफ कासट
डा. आंबेडकर द्ारा लिखित यह बहुचर्चित पुसतक है, इसका प्रकाशन 1936 में हुआ । जात-पांत तोड़क मणडल द्ारा आयोजित उसके
वार्षिक अधिवेशन में लाहौर में मार्च 1936 में डा. आंबेडकर को अधयक्षीय भाषण देने के लिये आमंवत्त किया गया था, लेकिन मणडल के सदसयों ने जब काय्वरिि से पूर्व डा. आंबेडकर के इस भाषण को देखा तो उनहें यह आपवतिजनक लगा । मणडल के सदसयों ने इस भाषण में परिवर्तन के लिए डा. आंबेडकर से अनुरोध किया, लेकिन डा. साहेब भाषण में कोई भषी परिवर्तन करने से सपषट मना कर दिया । अनततोगतिा मणडल के इस वार्षिक अधिवेशन के काय्वरिि को रद् कर दिया । डा. आंबेडकर ने इसषी भाषण को जयों का तयों 1936 में‘ एनाहिलेशन ऑफ कासट’ के नाम से पुसतक के रूप में प्रकाशित करवा दिया ताकि अधिक से अधिक लोग इसके बारे में जान सकें । यह पुसतक छोटषी सषी है, लेकिन बहुत हषी गंभषीर है । इस पुसतक में डा. आंबेडकर ने जाति वयिसथा के आधार पर उसके उनिूलन के संबंध में गंभषीर चर्चा कषी है ।
रानाडे, गांधी ए्ड जिन्ा
जनवरषी 1943 में डा. आंबेडकर ने पूना में एम. जषी. रानाडे के जनि समारोह के उपलक्य में एक वयाखयान दिया, जो आगे चलकर रानाडे, गांधषी एवं जिन्ना के रूप में प्रकाशित हुआ । इस पुसतक में रानाडे, गांधषी और जिन्ना के वयसकतति का तुलनातिक अधययन किया गया है तथा बताया गया है कि नायक पूजा( हषीरो वर्शिप) अच्छी बात नहीं है, कयोंकि अनततोगतिा वह
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