April 2026_DA | Page 37

असमर्थताएं हैं, के राजनीतिक सिद्धांत को सवीकार करने के लिए मजबूर कर दिया ।
वायसराय को कार्यकारी पार्षद पद अथवा मंत्रिमंडल में मंत्री पद डा. आंबेडकर को जन विचारधारा, विशेषतः हरिजनों एवं शोषित वगषों की सामाजिक जागरूकता और धार्मिक विद्रोह तथा सामूहिक विचारधारा के पुनर्निर्माण के हित में अपने अधययन और लेखन कार्य से नहीं रोक सका । शूद्रों के संबंध में उनका श्ेष्ठ शोध कार्य पारमपरिक इतिहासकारों एवं पौराणिक शाकसत्रयों के लिये एक चुनौती था और यह उस समय तैयार किया गया और लोगों के समक् रखा गया था, जब वह सरकार में सववोच्च पद पर थे ।
उनहोंने महसूस किया कि सदियों पुरानी हीनता की उस भावना को, जिसने शोषित वर्ग के सामाजिक सतर और दिल-दिमाग को बौना बना दिया है, मात्र सांस्कृतिक और बुद्धिमतापूर्ण तन एवं विचार परिवर्तनों से बदला नहीं जा सकता । अतः उनहोंने निष्कर्ष निकाला कि उनहें आर्थिक और राजनीतिक दोनों ही अधिकार प्दत् करने होंगे । इसीलिए उनहोंने मौलिक अधिकारों और निदेशक सिद्धांतों के लिये कांग्ेस के प्सतावों का सहोललास समर्थन किया । भारत के आम लोगों को हिनदू धर्म की सर्वत्र वयापत विचारधाराओं से परिपूर्ण पौराणिक वातावरण से सवतंत्र कराने के लिये उनहोंने उनहें हिनदूमत से बाहर निकालने
का निशिय किया और सववोत्म वैककलपक धर्म के रूप में उनहें बौद्ध धर्म अपनाने में मदद की वह सवयं भी बौद्ध धर्म के अनुयायी बन गए और उनहोंने काफी अधिक सं्या में हरिजनों, मु्य रूप से महाराष्ट्वासियों को बौद्ध धर्म अपनाने के लिये राजी कर लिया । यद्यपि रिांजतकारी तरीकों को लेकर उनमें और सामयवादियों में काफी समानता थी, तथापि वह उनके देशेतर निष्ठा और बंदूक की नोक वाली बात के पूर्णतः विरुद्ध थे । अतः उनके मजदूर संघ ने सामयवादी प्धानता वाले अखिल भारतीय मजदूर संघ का अनुसरण करने से इंकार कर दिया ।
डा. आंबेडकर ने महसूस किया कि आने वाले लमबे समय तक अधिकांश हरिजन और पद्जलत वर्ग एवं निम्न और मधयम वर्ग के लोग मजदूरी कमाने वाले ही रहेंगे । इसलिए श्जमक वर्ग के हितों की रक्ा सामानय कसथजत में सुधार करने वाले उपायों से ही की जा सकती है । अतः उनहोंने मजदूर संघों और उनसे संबंधित विधान का समर्थन पूरे शौक से किया था । जब मैंने ककृजषकर लोक दल की ओर से एक समूह बनाया, तो उनहोंने एक भूतपूर्व मंत्री सहित अपने तीन अनुयायियों को ककृजषकर लोकदल में शामिल होने के लिए प्ेरित किया । तब उनहोंने मुझे बताया था कि वह इस बात से अतयजधक प्सन्न हैं कि
हम एक सवतंत्र संसदीय संघ बना पाए हैं । यद्यपि वह संसद में एक सवतंत्र सदसय के रूप में रहे तथापि जब कभी भी मुझे आवशयकता पडी, उनहोंने किसानों और श्जमकों के हितों का अपने भाषणों के माधयम से समर्थन किया और मुझे अपना सहयोगी माना ।
यह सच है कि भारत का संविधान उन बुद्धिमान लोकतंत्रवादियों का कार्य है जिनहोंने वासतव में जनता की प्गति की कामना की थी । इसके विधायी ढांचे का निर्माण और वा्यरचना अलादी और मुंशी जैसे प्जतकष्ठत विधि शाकसत्रयों ने की थी । संविधान सभा में दिए गए डा. आंबेडकर के जवद्तापूर्ण भाषण संविधान निर्माण में उनके पांडितयपूर्ण तथा सवतंत्र विचारों और दूरदर्शिता का परिचय देते हैं । वह एक सच्चे लोकतंत्रवादी थे । वह भारतीय सवराज के भावी सामाजिक लोकतंत्र के मानवोचित जनदनेशक के रूप में जीवित रहे ।
( प्ो रंगा 1946 में संविधान सभा के सदस्य चुने गए । 1952 से लेकर 1991 तक संसद के सदस्य रहे । उनका यह लेख 1991 में लोकसभा सचिवालय द्ारा प्काशित ' सुप्वसद्ध सांसद( मोनोग्ाफ सीरीज) डा. बी. आर. आंबेडकर ' नामक पुस्तक में सम्मवलत किया गया था । पाठकों के लिए यह लेख साभार प्स्तुत किया गया है ।)
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