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डा. आंबेडकर और सार्ाजिक आर्थिक लोकतंत्र

डा. नरेंद्र जाधव

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भीम राव आंबेडकर मानवाधिकारों तथा लोकतंत्र के प्बल समर्थक थे । ' अखिल भारतीय डिप्ेसि ्लासेस ' के अधिवेशन में भाषण करते हुए उनहोंने कहा " मैं यह मानता हूँ कि मनुष्यों के बीच संबंधों का निर्धारण करने वाला ' लोकतंत्र ' का सिद्धांत इस दुनिया से लुपत न हो जाए, यह देखने का महतवपूर्ण दायितव हम सभी को उठाना है । यदि हम लोकतंत्र में विशवास रखते हैं तो हमें इसके प्जत ईमानदार और निष्ठावान रहना होगा । केवल लोकतंत्र के संबंध में विशवास रखने से काम नहीं चलेगा । अपने किसी भी ककृतय से लोकतंत्र के शत्रुओं द्ारा सवतंत्रता, समता और बंधुतव जैसे लोकतंत्र के आधारसतंभों को हानि पहुंचाने से भी सुरजक्त रखना होगा । यह हम सभी का परम कर्तवय है ।" डा.
आंबेडकर की लोकतंत्र की संकलपना राजनीतिक सवतंत्रता, समता तथा बंधुतव की आम संकलपना से अधिक वयापक थी । उनहोंने लोकतंत्र के आर्थिक और सामाजिक पहलुओं पर बल दिया और यह कहा कि यदि आर्थिक और सामाजिक लोकतंत्र न हुआ तो केवल राजनीतिक लोकतंत्र सफल नहीं हो पाएगा ।
लोकतंत् की परिभाषा
डा. आंबेडकर ने अनेक दार्शनिकों, समाजशाकसत्रयों तथा राजनीतिज्ों द्ारा की गई लोकतंत्र की परिभाषाओं का उललेख किया है । वलॉलिर बॅगेहोट की परिभाषा ' चर्चा के माधयम से शासन ' तथा लिंकन की परिभाषा ' जनता का, जनता के लिए जनता द्ारा किया जानेवाला शासन ' वह विशेष रूप से याद करते हैं । तथापि इन बहुश्ुत और रूढ़ परिभाषाओं से भिन्न वह
लोकतंत्र को " र्तपात पर निर्भर न करते हुए जनता के आर्थिक और सामाजिक जीवन में रिांजतकारी परिवर्तन लानेवाली शासन प्णाली " कहते हैं । वह कहते हैं कि " जिस शासन प्णाली में शासकों द्ारा जनता के आर्थिक और सामाजिक जीवन में आमूल परिवर्तन लाना संभव हो तथा जिनहें जनता भी र्तपात से मु्त बिना शिकायत सवीकार कर ले, उसे मैं लोकतंत्र मानता हूं । यही इसकी असली परीक्ा है । यह परीक्ा अतयंत कठिन हो सकती है । परंतु जब आप किसी वसतु के गुण-दोषों का मूलयांकन करते हैं तो आपको कडी- से-कडी कसौटी का प्योग करना ही चाहिए ।" इससे सपष्ि है कि डा. आंबेडकर लोकतंत्र को एक अंतिम लक्य नहीं बकलक वांछित सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन लाने का एक प्भावशाली साधन मानते थे ।
" सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र तो
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