जन्मदिन पर विशेष
1920 में कोलहापुर के छत्रपति शाहूजी महाराज की वित्ीय सहायता से एक मित्र से वयक्तगत ऋण और भारत में अपने समय की बचत के साथ, डा. आंबेडकर अपनी शिक्ा पूरी करने के लिए लंदन लौट आए । 1922 में उनहें बार में बुलाया गया और वह बैरिसिर-एट-ललॉ बन गए । उनहोंने एलएसई से एमएससी और डीएससी भी पूरा किया । उनकी डॉक्टरेट थीसिस बाद में ' रुपए की समसया ' के रूप में प्काशित हुई ।
भारत लौटने के बाद डा. आंबेडकर ने बजहष्ककृत हितकारिणी सभा( बजहष्ककृत लोगों के कलयाण के लिए सोसायटी) की सथापना की और भारतीय समाज की ऐतिहासिक रूप से उतपीजडत जातियों के लिए नयाय और सार्वजनिक संसाधनों तक समान पहुंच की मांग के लिए
1927 में महाड सतयाग्ह जैसे सामाजिक आंदोलनों का नेतृतव किया । उसी वर्ष उनहोंने मनोनीत सदसय के रूप में बलॉमबे विधान परिषद में प्वेश किया ।
इसके बाद डा. आंबेडकर ने 1928 में संवैधानिक सुधारों पर भारतीय वैधानिक आयोग, जिसे‘ साइमन आयोग’ भी कहा जाता है, के समक् अपनी बात रखी । साइमन आयोग की रिपोर्ट के परिणामसवरूप 1930-32 के बीच तीन गोलमेज सममेलन हुए, जहां डा. आंबेडकर को आमंत्रित किया गया था अपना निवेदन प्सतुत करने के लिए ।
1935 में डा. आंबेडकर को गवर्नमेंट ललॉ कलॉलेज, मुंबई के जप्ंजसपल के रूप में नियु्त किया गया, जहां वह 1928 से प्ोफेसर के रूप में पढ़ा रहे थे । इसके बाद, उनहें वायसराय की
कार्यकारी परिषद में श्म सदसय( 1942-46) के रूप में नियु्त किया गया । 1946 में वह भारत की संविधान सभा के लिए चुने गए । 15 अगसत 1947 को उनहोंने सवतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री के रूप में शपथ ली । इसके बाद, उनहें संविधान सभा की मसौदा समिति का अधयक् चुना गया और उनहोंने भारत के संविधान का मसौदा तैयार करने की प्जरिया का नेतृतव किया ।
संविधान सभा के सदसय महावीर तयागी ने डा. आंबेडकर को ' मु्य कलाकार ' के रूप में वर्णित किया, जिनहोंने ' अपना रिश अलग रखा और जनता के देखने और टिपपणी करने के लिए चित्र का अनावरण किया '। डा. राजेंद्र प्साद, जिनहोंने संविधान सभा की अधयक्ता की और बाद में भारतीय गणराजय के पहले राष्ट्पति बने, ने कहा था कि सभापति पर बैठकर और दिन-प्जतजदन की कार्यवाही को देखते हुए, मुझे एहसास हुआ कि कोई और नहीं कर सकता था, किस उतसाह के साथ । और प्ारूप समिति के सदसयों और विशेषकर इसके अधयक् डा. आंबेडकर ने अपने उदासीन सवास्थय के बावजूद भी निष्ठापूर्वक कार्य किया । हम कभी भी कोई ऐसा निर्णय नहीं ले सके जो इतना सही था या हो सकता था जब हमने उनहें मसौदा समिति में रखा और उनहें इसका अधयक् बनाया । उनहोंने न केवल अपने चयन को सही ठहराया है, बकलक जो काम उनहोंने किया है, उसमें और भी चमक ला दी है ।
1952 में पहले आम चुनाव के बाद वह राजय सभा के सदसय बने । उसी वर्ष उनहें कोलंबिया विशवजवद्यालय से डॉक्टरेट की मानद उपाधि से भी सममाजनत किया गया । 1953 में, उनहें उसमाजनया विशवजवद्यालय, हैदराबाद से एक और मानद डॉक्टरेट की उपाधि से भी सममाजनत किया गया । लंबी बीमारी के कारण 1955 में डा. आंबेडकर का सवास्थय खराब हो गया और 6 दिसंबर 1956 को दिलली में नींद में ही उनका निधन हो गया ।
( साभार)
24 vizSy 2026