September 2026_DA | Página 32

भारत मेें अस्पपृश्यता का उदय विदेशी मेुक्स््लमे आरिांताओं के शासनका्ल मेें हुआI इसका एकमेात्र कारण था वहन्ददुओं का सब कुछ ्लूटकर, उन पर भारी अत्याचार, व्यवभचार के उपरांत उनको मेपृत्युदंड से डराकर, इस््ललाम स्िीकार कराना था ।

विशे्ष

त्थाकल्थत कई लेखकों का विचार है कि जातिवाद का मेूल कारण वेद और मेनु स्मेृलत है, परन्तु वैदिक काल और प्राचीन भारत मेें जातिवाद या छुआछूत के अल्स्तत्व से तो विदेशी लेखक भी स्पष््ट रूप से इंकार करते है । प्राचीनकाल मेंल वणणा होते ्थे लेकिन वणणा वर््तमान मेें जाति या वगणा का रूप धारण कर लिया । वैदिक काल मेें वणणा व्यवस््था प्रधान ्थी जिसके अनुसार जैसा जिसका गुण वैसे उसके कर््म, जैसे जिसके कर््म वैसा उसका वणणा लनिाणारण का लसधिांत ्था । यहां पर स्वाभाविक प्रश्न उठिता है कि जाति और वणणा मेें क्या अंतर है? तो जाति का तात्पयणा है उद्व के आधार पर किया गया वगगीकरण है । वैदिक काल मेें ब्ाह्मण, क्षलत्य, वैश्य और शूद्र के लिए " वणणा " शब्द का प्रयोग किया गया । वणणा का मेतलब है वणणा को चुनने का आधार गुण, कर््म और स्वभाव होता है ।
वणणा चिंतन पूणणा रूप से वैदिक चिंतन है एवं इसका मेुख्य प्रयोजन समेाज मेें मेनुष्य को परस्पर सहयोगी बनाकर भिन्न-भिन्न कामोों को परस्पर बां्टना, किसी भी कायणा को उसके अनुरूप दक्ष व्यल्क्त से करवाना, सभी मेनुष्यों को उनकी योग्यता अनुरूप कामे पर लगाना एवं उनकी आजीविका का प्रबंध करना है । स्वामेी दयानंद ने वेदों का अनुशीलन करते हुए पाया कि वेद सभी मेनुष्यों और सभी वणगों के लोगों के लिए स्वयं वेद पढ़ने के अधिकार का समे्थणान करते है । हिन्दू समेाज मेें समेय परिवतणान के सा्थ आयी
भारत मेें अस्पपृश्यता का उदय विदेशी मेुक्स््लमे आरिांताओं के शासनका्ल मेें हुआI इसका एकमेात्र कारण था वहन्ददुओं का सब कुछ ्लूटकर, उन पर भारी अत्याचार, व्यवभचार के उपरांत उनको मेपृत्युदंड से डराकर, इस््ललाम स्िीकार कराना था ।
जल्टिताओं और फिर विदेशी मेुस््ललिम आरिांताओं और अंग्ेजों ने अपने लहतों के लिए भारत की विशाल हिन्दू जनसंख्या को अपने ढंग से प्रयोग हेतु उच्च जाति एवं निम्न जाति बोध के सा्थ जातिवाद की नींव डाली । हिन्दू समेाज को तोड़ने के लिए त्थाकल्थत बुलधिजीलवयों ने अपने-अपने ढंग से दलित समेाज की व्याख्या की और उनकी तुलना शूद्रों से करके हिन्दू समेाज का अहित करने का कामे किया ।
अनुसूचित जाति की उत्पवति
भारत मेें अस्पृश्यता का उदय विदेशी मेुस््ललिम आरिांताओं के शासनकाल मेें हुआI इसका एकमेात् कारण ्था हिन्दुओं का सब कुछ लू्टकर, उन पर भारी अत्याचार, व्यलभचार के उपरांत उनको मेृत्युदंड से डराकर, इस्िामे स्वीकार कराना ्था । हिन्दू धर््म ग्ं्थों मेें प्रक्षिप्तता एवं हिन्दू समेाज के प्रति भयानक दुभाणावना के सन्दभणा मेें तथ्यात््मक अध्ययन के लिए इतिहास के उन पृष्ठिों को पि्टा जाए जो यह प्रमेाणित करते हैं कि एक समेय ऐसा भी ्था जब देश के पश््चचिमी
त्ट पर एक शरणार्थी के रूप मेें रोजी-रो्टी प्राप्त करने के लिए अरब देिों की मेुस््ललिम जनसंख्या हिन्दुस््थान के सन्मेुख नतमेस्तक ्थी । उनके चरणबधि आरिमेणों का प्रहार झेलते हुए हिन्दुस््थान ने कड़ा प्रतिउत्र दिया, लेकिन विदेशी मेुस््ललिम आरिांताओं के द्ारा प्रारूपित आंतरिक कलह एवं वैमेनस्यता के कारण हिन्दू समेाज की कमेजोर पड़ गयी दीवार अभेद्य नहीं रही ।
विदेशी मेुस््ललिम आरिांता आक्रमणकाररयों का स्वालभमेानी, धर््ममाभिमानी एवं राष्ट्रालभमेानी हिन्दू धर््म रक्षकों से लगातार हुए संघषणा के बाद मेुस््ललिम शासकों ने यह रणनीति बनाई कि हिन्दुओं को गुलामे एवं हिन्दुस््थान पर अगर शासन करना है तो हिन्दू धर््म एवं संस्कृलत रक्षक ब्ाह्मणों एवं भौगोलिक सीमेा के रक्षक क्षलत्यों के सा्थ हिन्दू धर््म को नष््ट करना ही होगाI इसके बाद हिन्दुस््थान पर मेुस््ललिम शासकों का जो अत्याचार शुरू हुआ, उसके तहत मेंदिर और देवाियों के सा्थ ही हिन्दू धर््म ग्ं्थों को खोज- खोज कर नष््ट किया गया । हिन्दू समेाज को तहस-नहस करने वाले विदेशी मेुस््ललिम
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