संपादकीय
सामाजिक बहिष्ार से सत्ा, शिक्ा और सम्ान में आयी गिरावट अब दलित उत्ान की बदलती तस्ीर
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रत मेें दलित समेाज के उत््थान की कहानी केवल आरक्षण की कहानी नहीं है, बल््कक यह सलदयों पुराने सामेाजिक बहिष्कार से नागरिक अधिकार, शिक्षा, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और आत््मसम्मेान तक पहुंचने की लंबी यात्ा है । 2026 मेें जब हमे इस यात्ा को पीछे मेुड़कर देखते हैं तो स्पष््ट दिखाई देता है कि 1990 के बाद का कालखंड दलित समेाज के लिए लनणाणायक सामेाजिक-राजनीतिक परिवतणान का कालखंड रहा । यद्यपि यह स्पष््ट करना आवश्यक है कि अनुसूचित जालतयों के लिए संवैधानिक संरक्षण और आरक्षण की व्यवस््था 1990 से प्रारंभ नहीं हुई ्थी । संविधान लागू होने के सा्थ ही राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सरकारी सेवाओं त्था शिक्षा मेें सामेाजिक न्याय की व्यवस््था विकसित हो चुकी ्थी । 1990 का दशक इसलिए मेहत्वपूणणा ्था क्योंकि इस कालखंड मेें सामेाजिक न्याय का राजनीतिक विमर््श व्यापक हुआ और वंचित समेुदायों की राजनीतिक चेतना को नया बल प्राप्त लमेिा । इस परिवतणान का सबसे बड़ा प्रभाव शिक्षा पर दिखाई देता है । आंकड़ों के अनुसार अनुसूचित जाति की साक्षरता दर 1991 मेें लगभग 37.4 प्रतिशत ्थी, जो 2001 मेें 54.7 प्रतिशत और 2011 मेें 66.1 प्रतिशत तक पहुंच गई । अनुसूचित जाति की मेलहिाओं मेें यह वृलधि और भी मेहत्वपूणणा रही— 1991 मेें लगभग 23.8 प्रतिशत से बढ़कर 2001 मेें 41.9 प्रतिशत और 2011 मेें 56.5 प्रतिशत हुई । यह केवल आंकड़ों मेें वृलधि नहीं ्थी; इसका अर््थ ्था कि वह समेाज, जो किंही कारणों से लंबे समेय तक औपचारिक शिक्षा से दूर रहा, उसकी नई पीढ़ी विद्यालय, मेहाविद्यालय और विश्वलवद्यािय तक पहुंचने लगी ।
1990 के बाद शिक्षा के विस्तार ने दलित समेाज मेें आल्थथिक रूप एक नया मेध्यवगणा एवं उन्नत वगणा तैयार किया । सरकारी नौकररयों मेें आरक्षण ने पहली पीढ़ी के शिक्षित युवाओं को स््थथिर रोजगार और सामेाजिक सुरक्षा दी । इसके उपरांत दूसरी पीढ़ी ने केवल नौकरी को लक्षय नहीं मेाना, बल््कक प्रशासन, राजनीति, न्यायपालिका, शिक्षा, चिकित्सा, तकनीक, उद्योग और व्यवसाय जैसे क्षेत्ों मेें प्रवेश का रास्ता निकालना प्रारंभ किया । यही वह बदलाव है जिसने दलित समेाज के भीतर आत््मविश्वास को बल दिया ।
लनिणानता के आंकड़े भी परिवतणान की दिशा बताते हैं । नीति आयोग के पुराने आधिकारिक आकिनों मेें तेंदुलकर पधिलत के अनुसार अनुसूचित जालतयों कीलनिणानता दर 1993-94 मेें 60.5 प्रतिशत ्थी, जो 2004-05 मेें 50.9 प्रतिशत और 2011-12 मेें 29.4 प्रतिशत तक घ्ट गई । यह गिराव्ट केवल आरक्षण का
परिणामे नहीं ्थी; आल्थथिक विकास, ग्रामीण रोजगार, शिक्षा, क्कयाणकारी योजनाओं और सावणाजनिक निवेश सहित अनेक कारकों ने इसमेें भूलमेका निभाई । इसका प्रमेाण यह है कि दलित वगगीय जालतयों की सरकारी नौकररयों और शिक्षा मेें प्रतिनिधित्व ने दलित परिवारों के एक हिस्से को लनिणानता से बाहर निकलने का अवसर दिया ।
राजनीतिक प्रतिनिधित्व इस परिवतणान का दूसरा बड़ा क्षेत् है । लोकसभा मेें अनुसूचित जालतयों के लिए आरक्षित सीटोों की संख्या लंबे समेय से 79 रही, जबकि 2009 के बाद परिसीमेन के आधार पर यह संख्या 84 हो गई और 2014, 2019 त्था 2024 के चुनावों मेें भी 84 सीटेें आरक्षित रहीं । राजनीतिक रूप से दिया गया आरक्षण का अर््थ केवल संसद मेें सीटोों की संख्या नहीं है अपितु इसका वास्तलवक मेहत्व यह है कि लोकतंत् मेें जिन समेुदायों की आवाज लंबे समेय तक कमेजोर रही, उनके लिए संवैधानिक रूप से राजनीतिक प्रतिनिधित्व सुलनल्श्चत हुआ । उच्च शिक्षा मेें तस्वीर लनल्श्चत रूप से बदली है । शिक्षा मेंत्ािय के आंकड़ों के अनुसार 2021-22 मेें उच्च शिक्षा मेें अनुसूचित जाति के लवद्याल्थणायों की संख्या 66.23 लाख तक पहुंच गई ्थी, जबकि 2014-15 मेें यह लगभग 46.07 लाख ्थी । यानी इस अवधि मेें लगभग 43.8 प्रतिशत की वृलधि हुई । अनुसूचित जाति की छात्ाओं का नामेांकन भी 2014-15 के लगभग 21.02 लाख से बढ़कर 2021-22 मेें 31.71 लाख हुआ । 2026 मेें उपलब्ि नवीनतमे सरकारी रिपो्टटें भी इस सकारात््मक रुझान को रेखांकित करती हैं ।
यह परिवतणान इसलिए मेहत्वपूणणा है क्योंकि दलित समेाज की सबसे बड़ी ऐतिहासिक बाधाओं मेें शिक्षा की अनुपलब्िता शालमेि रही है । जब किसी समेुदाय की बे्टी विश्वलवद्यािय तक पहुंचती है, प्रतियोगी परीक्षा देती है, शोध करती है या व्यवसायिक शिक्षा प्राप्त करती है तो वह केवल अपनी जीवस्तर नहीं बदलती, बल््कक पूरे परिवार की सामेाजिक स््थथिति को प्रभावित करती है ।
फिर भी 2026 मेें यह दावा करना ज्कदबाजी होगी कि सामेाजिक बराबरी प्राप्त हो हो चुकी है । शिक्षा के अवसर बढ़ने के उपरान्त उच्च गुणवत्ा वाली शिक्षा, प्रतिष््ठठित संस््थानों मेें प्रवेश, शोध, तकनीकी शिक्षा और रोजगार के बीच अभी भी अंतर दिखाई देता है । सरकारी आंकड़े उपिल्ब्ियों की कहानी बताते हैं, लेकिन वे यह भी संकेत देते हैं कि अगली लड़ाई केवल प्रवेश की नहीं, बल््कक गुणवत्ा और परिणामे की है ।
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